जिसपे दुनियां को पसीना आ गया
जिसपे दुनियां को पसीना आ गया, मुझको आसानी से जीना आ गया, है अजब सा वाक़या पर सच भी है, ग़ैर के ज़ख्मों को सींना आ गया, मेरी आँखों में अजब तासीर थी, चल के साहिल पे सफ़ीना आ गया, लोग छाती पीट कर क्यूँ रो गये क्या मोहर्रम का महीना आ गया? ज़िन्दगी पाकर सभी यूँ खुश हुए, जैसे हाथों में नगीना आ गया... जब से देखा शाम-ए-हश्र-ए-आफ़ताब, बस के तबियत में करीना आ गया.. उर्मिला माधव, 2.9.2017 |
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