उसने पूछा भी नहीं,मैंने बताया भी नहीं
उसने पूछा भी नहीं,मैंने बताया भी नहीं,
वक़्त-ए-रुख़सत वो मुझे देखने आया भी नहीं,
वक़्त-ए-रुख़सत वो मुझे देखने आया भी नहीं,
आंखें झपकीं न गईं मुझ से बहुत देर तलक,
लोग ग़फ़लत में रहे,जिस्म उठाया भी नहीं...
लोग ग़फ़लत में रहे,जिस्म उठाया भी नहीं...
आगया फिर वो निभाने को यूं ही रस्म-ए-चराग़,
कांपती लौ को हवाओं से बचाया भी नहीं,
उर्मिला माधव,
12.8.2017
कांपती लौ को हवाओं से बचाया भी नहीं,
उर्मिला माधव,
12.8.2017
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