अफ़साना

श्रद्धा नाइक एक आला अफ़साना निगार थीं, और बहुत आला दर्ज़े में शुमार होती थीं,
6 दहाइयाँ पार कर चुकी थीं। देखने में बेहद ख़ूबसूरत थीं..लेकिन उनका अपनी खूबसूरती से कोई लेना-देना नहीं था, सिर्फ़ लिखती रहती थीं,ख़ुद से बातें करना उनको बहुत अच्छा लगता था,अक्सर लोग उनसे मुलाक़ात करने आया करते थे,जहां तक हो सकता था,हर छोटे-बड़े , सबकी इज़्ज़त करती थीं,सभी नौजवान लड़के-लड़कियां और ज़ियादहतर,ख़वातीन ओ हज़रात सभी उनसे मुतास्सिर होते थे,
एक रोज़ वो यकायक बहुत अचकचा गईं जब एक ख़त उनके पास आया जिसमें कुछ गुलाब की सूखी पत्तियां भी थीं और इत्र की खुशबू में रचा बसा ख़त देखने में भी बहुत ख़ूबसूरत था उनको ख़त खोलने की बहुत जल्दी हुई ख़ैर ख़त खोला गया,ख़त में जो लिखा था वैसी उम्मीद वो नहीं रखती थीं। क्यूंकि वो उस ज़बान को नही पढ़ सकती थीं।
श्रद्धा जी ने भेजने वाले के ठिकाने पर ख़याल ही नहीं किया था, वो ख़त आसाम से भेजा गया था जिसे पढ़ना उनके लिए मुमकिन नहीं था वो असमियां ज़बान में लिखा गया था ,लिखने वाला एक नौजवान था जिसने साथ में अपनी एक तस्वीर भी भेजी थी वो समझ नहीं सकीं के वो सब क्या था और क्यों था !!
वो बहुत परेशान थीं के इसमें लिखा क्या था ख़ैर उन्होंने एक फैसला किया औऱ उसी पते पर उस नौजवान को हिंदी में खत लिखा और कहा, मेरी एक बेटी है,जिसकी शादी हो चुकी है और वो परदेस में रहती है,आप कौन हैं बहुत ख़ूबसूरत हैं यदि बेटी की शादी नहीं हुई होती तो आपके लिए सोच कर मुझे बहुत खुशी होती,पर अब तो आपने भेजा भी है तो ज़ाया हो गया।। आपके लिए दुआ रहेगी जहां भी रहें हमेशा खुश रहें।। आमीन ...
और बस ख़त डाक से भेज दिया,उसके बाद भूल गईं..
पर ख़त के जवाब में ख़त आ गया,उनको ख़ासी हैरत हुई और खोला तो अंग्रेज़ी में लिखा था के उसने वो ख़त श्रद्धा जी के लिए लिखा है लेकिन क्या लिखा है ये मैं ख़ुद ज़बानी बतलाऊंगा..

अभी यहीं तक......
उर्मिला माधव,
17.7.2017
गतांक से आगे----

श्रद्धा नाइक जी सोच में पड़ गईं , ये कैसा नौजवान है,क्या लिखता है?, क्या कहना चाहता है?बहुत फ़िक़्र मंद हो गईं,डरने लगीं,आख़िर क्या कहेगा ? और हर रोज़ इंतज़ार करने लगीं कब उसको आना है और क्या कहना है?
पर ख़तों का सिलसिला जारी रखा उसने लेकिन ज़बान असमियां ही रखी,वो पढ़ तो नहीं पाती थीं लेकिन खोलती ज़रूर थीं और फ़िर परेशान हो जातीं।अब वो qaअपनी जानिब से कोई ख़त नहीं लिखती थीं।
लेकिन एक दिन उन्होंने ख़त लिखा और कहा कि वो उनको नाहक़ ही परेशान न करे या तो इंग्लिश में लिखे ताकि वो समझ सकें के वो क्या कहना चाहता है वरना ये सिलसिला ख़त्म करदे,लेकिन उसने सिलसिला जारी रखा और वो परेशान होती रहीं,सोचा करती थीं उसने इस क़दर परेशान क्यूं कर रखा है बहुत दुःखी रहने लगीं और इस तरह धीरे-धीरे बीमार रहने लगीं।
उनको काग़ज़ क़लम से लिखना बहुत मन भाता था लेकिन धीरे-धीरे थकने लगीं। पर लिखना उनकी आदत थी और अफ़साने लिखना जारी रखा। पर जो कभी तन्हाई का एहसास तक नहीं जानती थीं,उसको महसूस करने लगीं, और घंटों वीरान सी आंखों से एक ही जगह घूरती रहतीं।
उनकी शादी उनके वाल्दैन ने की थी सो इश्क़ का क्या मिज़ाज होता है,नहीं जानती थीं या नहीं जानने का मुज़ाहिरा करती थीं।।
एक रोज़ बहुत घबरा गईं, क्यूं घबरा गईं ख़ुद भी नहीं समझ सकीं और बेहोश जैसी होने लगी तो उनकी केयर टेकर जिसको उनकी बेटी ने वहां रखा था और बहुत ही ज़हीन किस्म की मुलाज़िम थी और उनकी बहुत ख़िदमत करती थी,दौड़ी हुई आई और उनको मसनद के सहारे बैठा दिया और डॉक्टर को फ़ोन कर दिया जिससे के वो उनका इलाज कर सके ।।
ख़ैर डॉक्टर आया और उसने बताया कि इनको डिप्रेशन होने लगा है इनको अकेले छोड़ना ठीक नहीं ख़ादिमा बोली में तो हमेशा ही इनके पास रहती हूं लेकिन ये अब ख़ामोश रहने लगी हैं और मैं समझ नहीं पाती हूँ क्या करूँ?
डॉक्टर नींद का इंजेक्शन देकर चला गया और श्रद्धा जी सो गईं...
ख़तों का आना बदस्तूर जारी रहा...
अभी यहीं तक....
उर्मिला माधव,
18.7.2017
दूसरी किश्त ---
श्रद्धा जी की नींद टूटी तो सर भारी लग रहा था फिर भी उठना तो था ही और वो जैसे-तैसे उठ गईं..
ख़ादिमा को बुला कर चाय मांगी और डाक लाने को बोलीं लेकिन तब तक डाकिया शायद पहुंचा नहीं था। वो ख़ामोश होकर कहीं एक ही जगह पर ताकने लगीं और यक़ायक अपना माज़ी उनको याद हो आया,किस तरह वाल्दैन ने न चाहते हुए भी उनकी शादी करदी थी और वो अनमनी सी ससुराल चली गई थीं,चूंकि कम उम्र थीं सो बहुत जी भी नहीं लग रहा था।
और घर की बहुत याद आया करती थी,हर वक़्त सोचती रहतीं कि किस तरह वाल्दैन के घर पहुंच जाएं और कभी वापस न आना पड़े पर सब कुछ सिर्फ़ सोचने भर से ही थोड़े ही हो जाता है सो आना-जाना होता रहता था और धीरे-धीरे उन्होंने दिल लगा लिया।चूंकि वो बेहद खूबसूरत थीं तो मुहल्ले में चर्चा रहता था फलां की दुल्हन देखने-दिखाने लायक है ,पर वो शुरू से ही इस तरफ़ से उदासीन सी थीं उनको इस ज़िक़्र के होने न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था उनको लगता के इस तरह का चर्चा किया जाना रवायत होती होगी इसलिए लोग पाबंदी से करते हैं...
उस दिन भी हर रोज़ की तरह शाम को होना था वो हुई भी पर वो इनसान जो उनका शौहर कहलाता था वो बहुत रात गुज़र जाने पर भी घर नहीं लौटा था और पूरे कुनबे में फ़िक़्र का माहौल तारी था वो ख़ुद भी अजीब सा महसूस कर रही थीं दूसरी बात ये के वो हामला थीं,अजीब कशमकश का माहौल था आख़िरश उनके शौहर घर नहीं लौटे अब चूंकि कोई ख़बर भी नहीं थी तो घर के लोग न तो रो ही पा रहे थे और न ही चुप रह पा रहे थे,इस तरह कई दिन,कई रातें,कई महीने,कई बरस बीत गए लेकिन कुछ पता ही नहीं चला।।
धीरे -धीरे बहुत लंबा वक़्त गुज़र गया और सभी कुछ धुंधला से गया,एक वही थीं जो वजूहात समझने की कोशिशें सी करती रहती थीं पर समझ कुछ भी नहीं पाती थीं।
इसी बीच उनके यहां एक बहुत ही प्यारी और ख़ूबसूरत बच्ची पैदा हुई.. जिसका नाम उन्होंने बड़े ही चाव से,'गौरांगी' रखा,गौरांगी नाइक..
बेटी को ख़ूब आला दर्ज़े की तालीम दी और उसकी मर्ज़ी और ख्वाहिश के मुताबिक परदेस भेज दिया जहां उसने अपनी पसंद से शादी करली और उसके ख़याल से वो बहुत ख़ुश भी थी।
जहां उनकी शादी हुई थी वहां सभी उनका आदर तो करते थे लेकिन शौहर के नहीं लौटने के बाद सबके सुलूक में बहुत फ़र्क़ आया था जिसको उन्होंने बड़ी ही शिद्दत से महसूस भी किया था फिर भी अमीर ख़ानदान में शादी हुई,ख़ुद के अफ़सानों की रॉयल्टी भी बहुत थी इसलिए पैसे की दिक़्क़तों का सामना कभी नहीं करना पड़ा, अकेली हो गई थीं तो ज़ियादः लिखती थीं।।
तभी ख़ादिमा की आवाज़ ने उनको माज़ी से बाहर खींचा वो खाना खाने को कह रही थी और उनको ख़तों का इंतज़ार सा रहने लगा था डाकिया आया ही नहीं था,
कुछ सोच में डूबी हुई सी वो दस्तरख़ान के पास पहुंचीं, बैठने ही वाली थीं के सासु जी ने कहा कोई तुमसे मिलने को आया है वो सवालिया नज़रों से देखने लगीं तो माँ बोलीं ,वो नहीं जानतीं,पहले कभी देखा नहीं।।
लेकिन जब तक वो उठ कर जातीं आने वाला,सामने आकर खड़ा हो गया वो हैरत अंगेज़ हो गईं,ये वही ख़त वाला नौजवान था उनकी हैरानी का कोई हिसाब नहीं था , वो जब तक कुछ समझ पातीं उस नौजवान ने उनके क़दम छू लिए ये बात और ज़ियादः हैरान कर गई,वो गुलाब की सूखी पत्तियां वो इत्र से महकता हुआ ख़त और पांव छूना सब को आपस में जोड़ने की कोशिश कर रही थीं..
नौजवान अच्छी ख़ासी हिंदी में बोला मेरा नाम अर्जुन है और मैं आसाम से आया हूँ ....
अभी यहीं तक...
आख़री किश्त....
श्रद्धा जी बहुत बेचैन सा महसूस करने लगीं फिर उन्होंने उस तरह ख़तों का मुसलसल सिलसिला जारी रखने की वजह जाननी चाही और नौजवान का पूरा तआरुफ़ भी जानना चाहा।

अर्जुन ने कहना शुरू किया--- मेरी वाल्दा शीतल कुमार असमियां ख़ातून थीं,उनको किसी ख़ूबसूरत इनसान से मुहब्बत हो गई और उन्होंने इंसान से ताल्लुक़ात के ज़रिए ढूंढे, और बस मिलने- जुलने लगीं शायद उसके बाद मैं पैदा हुआ होऊंगा, चूंकि मेरी पैदाइश के एक या दो महीने बाद मेरी वाल्दा मुझे वालिद के पास बहुत कमसिन उम्र में ही छोड़ कर चुपचाप कहीं चली गईं,कहाँ,कोई नहीं जानता। इसलिए मैंने उनको कभी देखा नहीं,और मेरी परवरिश शायद अकेले वालिद ने की। जब मैंने कुछ होश संभाला तब अपने वालिद को तन्हाई में पहरों रोते देखा औऱ मुझे मेरा छोटा सा वजूद हिलता हुआ सा लगा।
मुझे वालिद से कुछ बहुत पूछने की जुरअत नहीं होती थी क्यूंकि मैंने उनको कभी मुस्कुराते हुए देखा ही नहीं था,मैं छुप कर सहमी हुई नज़रों से उनको रोता हुआ देखता,और अपने एक सूटकेस में कभी गुलाब के फूल,कभी गुलाब के फूलों की माला रखते हुए देख लेता था,और वो उसके बाद उसमें ताला जड़ देते थे और अपने दफ्तर चले जाते थे।
एक रोज़ उनकी तबियत यक़ायक ही बहुत नासाज़ हो गई मैं तबतक माशाअल्लाह ख़ासा जवान हो गया था और डॉक्टर को बुला सकने के क़ाबिल था तो डॉक्टर को फ़ोन कर बुला भेजा, वालिद के हालात कुछ अच्छे नहीं थे ,मैं बहुत घबराया हुआ था, पर ख़ुद को ख़ुद ही मज़बूत करना था सो किया भी पर रह-रह कर हिम्मत टूटती थी और थका सा महसूस करता था।
यक़ायक मुझे ख़याल आया डैड तो सो रहे हैं और बीमार भी हैं तो उनका वो संदूक देखना चाहिए उसमें क्या ऐसा था जिसको खोलकर वो रोया करते हैं।
मैंने तकिए के नीचे से चाबी निकाली और खोला तो देखा एक बेहद ख़ूबसूरत ख़ातून की तस्वीर रखी थी,जिसकी गुलपोशी वो किया करते थे,मेरी समझ में कुछ नहीं आया और बहुत देर तक सोचता रहा के शायद यही मेरी वाल्दा होंगी जो कहीं गुम ही गई थीं।
फ़िर एक रोज़ डैड की हालत यक़ायक बहुत बिगड़ गई और लाखों कोशिशों पर भी उनको बचा सकने में मैं कामयाब नहीं रहा, और मैं निहायत ही तन्हा हो गया...
डैड के बग़ैर घर वीरान हो गया था और अपने माज़ी का राज़ अपने साथ ही ले गए थे पर मैं उस तस्वीर पर जिसे मैं अपनी वाल्दा समझता था गुलाब के फूल और गुलाब की मालाएं चढ़ाने लगा।
एक रोज़ मुझे बरबस ही ख़याल आया कि मॉम मुझे ऐसे छोड़ कर चली गईं तो वालिद उनके लिए इस क़दर रोते क्यों थे?
मैं दौड़ा हुआ गया और संदूक की ख़ानातलाशी कर डाली जहां उनकी कुछ तस्वीरें उन ख़ातून के साथ और ख़ातून के हाथ से लिखे कुछ ख़त मुझे मिले जिसमें पता मुझे मिला और आज उस पते पर मैं हाज़िर हूँ।
सुबोध नाइक का बेटा अर्जुन नाइक हूँ और मेरी वाल्दा मैंने कभी देखी नहीं,और कभी कुछ जाना भी नहीं क्या आप मुझे अपना बेटा क़बूल करेंगी ?
मेरा इस दुनियां में आपके सिवा कोई और नहीं।।।
श्रद्धा जी ने अपनी मांग का सिंदूर पोंछ डाला और अर्जुन को रोते हुए गले लगा लिया .........
बस .......
Urmila Madhav..
22.7.2017

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