सीखती हूँ मैं
बताऊँ क्या ज़माने ख़ुद को कितना रोकती हूँ मैं,
भटकती हूँ,संभलती हूँ, मगर कुछ सीखती हूँ मैं,
क़दम थकने लगे हों और खड़े रहना भी मुश्किल हो,
कहीं मैं गिर न जाऊं ख़ुद को इतना थामती हूँ मैं,
अजब मंज़रकशी है ज़िन्दगी ख़ालिस अदावत है,
यहां इंसां की साज़िश का तमाशा देखती हूँ मैं,
तजरुबा उम्र भर का है,मगर अब भी ये आलम है,
तग़ाफ़ुल के इशारों पर भी,सबको चाहती हूँ मैं,
ज़रूरत क्या सवेरा हर नफ़स ग़म में ही पिन्हा हो,
मुहब्बत खो गई क्यों कर हमेशा सोचती हूँ मैं,
उर्मिला माधव
25.6.2017
भटकती हूँ,संभलती हूँ, मगर कुछ सीखती हूँ मैं,
क़दम थकने लगे हों और खड़े रहना भी मुश्किल हो,
कहीं मैं गिर न जाऊं ख़ुद को इतना थामती हूँ मैं,
अजब मंज़रकशी है ज़िन्दगी ख़ालिस अदावत है,
यहां इंसां की साज़िश का तमाशा देखती हूँ मैं,
तजरुबा उम्र भर का है,मगर अब भी ये आलम है,
तग़ाफ़ुल के इशारों पर भी,सबको चाहती हूँ मैं,
ज़रूरत क्या सवेरा हर नफ़स ग़म में ही पिन्हा हो,
मुहब्बत खो गई क्यों कर हमेशा सोचती हूँ मैं,
उर्मिला माधव
25.6.2017
Comments
Post a Comment