दो क़दम चलना है मुश्किल,इस क़दर पुर ख़ार हूँ,
ये बता दे ज़िन्दगी क्या मैं बहुत दुश्वार हूँ ?
क्या करूँ होता नहीं हरगिज़ ज़माने से निबाह,
अपनी ज़ाती ज़िद को लेकर मैं बख़ुद बेज़ार हूँ,
अपने दिल को तोड़ कर चलना कभी जायज़ नहीं,
मैं भी तो अपनी तरह से जीने की हक़दार हूँ,
मुझको तन्हाई में रहना रास आया है बहोत,
है यही मुश्किल मेरी,बे-इन्तेहा ख़ुद्दार हूँ,
ख़ुद परस्ती के मुताबिक,ग़म शनासाई भी है,
इससे तो बेहतर है मुझको,ख़ुद-ब-ख़ुद ग़म ख़्वार हूँ,
उर्मिला माधव..
26.9.2016
ये बता दे ज़िन्दगी क्या मैं बहुत दुश्वार हूँ ?
क्या करूँ होता नहीं हरगिज़ ज़माने से निबाह,
अपनी ज़ाती ज़िद को लेकर मैं बख़ुद बेज़ार हूँ,
अपने दिल को तोड़ कर चलना कभी जायज़ नहीं,
मैं भी तो अपनी तरह से जीने की हक़दार हूँ,
मुझको तन्हाई में रहना रास आया है बहोत,
है यही मुश्किल मेरी,बे-इन्तेहा ख़ुद्दार हूँ,
ख़ुद परस्ती के मुताबिक,ग़म शनासाई भी है,
इससे तो बेहतर है मुझको,ख़ुद-ब-ख़ुद ग़म ख़्वार हूँ,
उर्मिला माधव..
26.9.2016
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