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Showing posts from February, 2025

सब समझते हैं बहुत आसान हूं

सब समझते हैं बहुत आसान हूँ, जैसे मैं दिलजोई का सामान हूँ, दिल्लगी करते हैं मुझसे बेसबब, बेरुख़ी का मैं अजब उन्वान हूँ, मेरी जानिब से सभी आज़ाद हैं, मैं तो अपने आप में ज़िंदान हूँ, मेरा अपना आशियाँ आबाद है मैं ही सदियों से बहुत वीरान हूँ, ये समझ कर भूल मत करना कभी, तुर्शी-ए-अहबाब से ...हलकान हूँ, लोग मिलते हैं तो हंस देती हूँ बस, पर किसी हरक़त से कब अनजान हूँ... उर्मिला माधव.. 2.3.2017

बेवफ़ा दोस्त को सीने से लगाए रक्खा

बे-वफ़ा दोस्त को ...सीने से लगाए रख्खा, उसने भी झूठ को हर दर्जा निभाये रख्खा, उसकी ख़ामोश सी रंजिश को हवा देते रहे, हमने मुस्कान को होठों पै सजाये रख्खा, हम दिखाने में कसर किसलिए रखते बोलो, हमने हर लम्हा उसे दोस्त जताए रख्खा , हमको हर बात की हर बार ख़बर होती रही, हमने हंस-हंसके हर इक राज़ छुपाये रख्खा, उर्मिला माधव... 1.3.2015...

अपनों की जुबां क्या कहने

ग़ैर की छोड़िये,अपनों की ज़ुबाँ क्या कहने पैने अलफ़ाज़ हैं,कब दिल से निकल पाते हैं चाहे हम जितना समेंटें ये मगर बिखरेंगे, ख़ाब तो ख़ाब हैं,बस नींद में पल पाते हैं जो भी ग़ैरों पे उठाते हैं सरासर उंगली, ऐसे शैतान कहाँ खुद को बदल पाते हैं ? उर्मिला माधव

दिलचस्पियां बाक़ी

तबीअत हट गयी सबसे, नहीं दिलचस्पियाँ बाक़ी बहुत समझीं, मगर फिर भी रहीं बारीक़ियां बाक़ी कभी किरदार मुश्किल था, कभी दिल पढ़ नहीं पाये ब-ज़ाहिर रौशनी हर सू, मगर तारीकियाँ बाक़ी हज़ारों किस्म के जल्वे, नुमायाँ रू ब रू हर पल मगर रब की निज़ामत में रहीं, वीरानियाँ बाक़ी मक़ाम ए ज़िन्दगी आसाँ नहीं, इतना भी सुन लीजे हज़ारों मर गए फिर भी रहीं क़ुर्बानियाँ बाक़ी जमा खर्चे ज़बानी देख के इंसाँ की फ़ितरत के लगा हमको अभी तक हैं बहुत तरतीबियां बाक़ी उर्मिला माधव 
दिल को मिला सुकून मगर सब से छूट कर, चाहा उसे हयात भर, जब दिल से टूट कर, जो दोस्त था मेरा वो कहीं मिल नहीं रहा, ना जाने किस तरफ़ को गया चैन लूट कर

कोई साथ न चलता हो

जब वक़्त बदलता हो,  कोई साथ न चलता हो, बेजा ये ज़माना है, बस इसको हटाना है ख़्वाबों से परे हट कर, अल्लाह से ज़िद मत कर, ये ख़ाक ज़माना है, इसमें तो न जाना है, बस दर्द इबादत है, हमको यही आदत है, हम छोड़ चुके सब को, बस याद करें रब को, जो फांस चुभी दिल में, अब तक न निकाली है, चेहरों के तमाशे हैं, दुनिया भी तो जाली है, सड़कों पे हैं चौराहे, तो जाए जहां चाहे, उर्मिला माधव ये एक नज़्म है मेरे दिल से निकली हुई

रंग दिखलाता रहा

वक़्त कितने रंग दिखलाता रहा, जाने किस-किस शक़्ल में आता रहा, फिर भी अपनी हिम्मतें सब जोडके, खुद मेरा दिल ,खुद को समझाता रहा, गाहे-गाहे,हिल गया मेरा वजूद, फ़िर भी हंसके ज़र्फ़ दिखलाता रहा, जान कर ही सब जहां की फितरतें, दिल फरेब-ए-ज़ीस्त भी खाता रहा,  एहतियातन कर लिया बस ऐतक़ाफ़, यक़-ब-यक़ जब हौसला जाता रहा, #उर्मिला  11.२.2015

सर निगूं हम

तुमको जिस रफ़्तार से वाबस्तगी है, मुझको उस रफ़्तार से रस्साकशी है, सर निगूं हैं सिर्फ़ हम आफ़ाक से, चलते रहना है मुसलसल, बेबसी है,

बालियां कानों की

बालियां कानों की मेरे हिल रही हैं, कान आहट पर लगे हैं, क्या मिरा कोई दोस्त है क्या, नहीं, शायद नहीं है, हवा आई है मुझसे बात करने, ठहर कर हाल मेरा पूछती है, इशारा कर रही है उन दरख़्तों की तरफ़, जो मुसाफ़िर को दिलासा दे रहे हैं, मुझे समझा रही है, कहीं दुनियां किसीकी दोस्त है क्या ? नहीं शायद नहीं है, बहुत से आए थे, लेकिन गए सब, अभी बाक़ी हैं, कितने और आने, कोई रुकता नहीं है, ज़रा उठ्ठो, नज़र भर कर तो देखो, तुम्हारे वास्ते भी रुक गया क्या ? नहीं शायद नहीं है, ये मीलों रास्ते चलकर जो आए हो यहां तक, तुम्हारे साथ कितने चल रहे थे, कोई साथी बचा है क्या अभी तक? नहीं शायद नहीं है, तो फ़िर क्या सोचना है तुम अभी तक भी तो तनहा ही चले हो, किसीके साथ की आदत बची है? नहीं शायद नहीं है नहीं शायद नहीं है... उर्मिला माधव 8.2.2018

आब ए जमजम

Meri duniyan hi juda hai aapse, Mutmaiin hun hi nahin insaf se, मेरी दुनियां ही अलग है आपसे, मुतमईन हरगिज़ नहीं इंसाफ़ से, Bhool baithe aab-e-zamzam ka jamaal, Jo vazuu karte rahe hain aab se, भूल बैठे आब-ए-ज़मज़म का जमाल, जो वज़ू करते रहे हैं आब से, Urmila Madhav उर्मिला माधव, 6.2.2016.

चलना पड़ा अगर

चल पाएंगे कितना, चलना पड़ा अगर ? रुक-रुक के पैरों को मलना पड़ा अगर ? हिम्मत तो कर ली है फ़िर भी डर ये है, शाम से पहले हमको, ढलना पड़ा अगर? उर्मिला माधव किसी दश्त से गुज़रेंगे तो क्या होगा ? सूरज के साए में जलना पड़ा अगर?