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Showing posts from January, 2025

एक दिन भारत भारत है

तारीफ़ करूँ क्या जज़्बे की, जो एक दिन भारत भारत है, क्या खूब खिलौने चाबी से..... चलते हैं बहुत हिक़ारत है, आपस में झगडे करते हैं, गद्दी की खातिर मरते हैं, है वतन भरा नक्कालों से, साबित है इनकी चालों से, क्या फ़ख्र करूँ मैं भारत पर, चोरों की लिखी इबारत पर, क्या भारत फिर भी भारत है?? जब के ये बिलकुल ग़ारत है, उर्मिला माधव... 26.1.2016...

नाराज़ भी हो सकती हूं

ज़िन्दगी तुझसे मैं नाराज़ भी हो सकती हूँ, ख़ुद-ब-ख़ुद मरने को तैयार भी हो सकती हूँ, चाहे जितना भी निबाहा हो तिरे साथ मगर, एक इनसान हूँ हस्सास भी हो सकती हूँ, दिन निकलते ही जो मैं जिस्म से उठ जाती हूँ, अपनी तबियत से कोई रात भी हो सकती हूँ, उर्मिला माधव 

सरहाने रख रही हूं

मैं किताबें अब सरहाने रख रही हूं, चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं, हर वरक संजीदगी के नाम है, एक माज़ी सोलह आने रख रही हूं, इक तजुर्बों का पुलिंदा,हर नफ़स, ज़िन्दगी के ताने-बाने रख रही हूँ, कुछ अंधेरे और दिए बुझने की राख़ और धुंए के कुछ ख़ज़ाने रख रही हूँ, गोकि एहसास-ए-घुटन हलका न हो, बंद करके,कुछ दहाने रख रही हूं,  जिस की दम पे दिन गिने हैं उम्र भर, अपनी तस्वीही के दाने रख रही हूँ, एक खनक आहों के हिस्से की भी है, सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं, उर्मिला माधव, 28.10.2017

प्यार का जाम पियो

प्यार का जाम पियो,गर जो पिला दे कोई, इतना एहसास रहे......ग़म न बढ़ा दे कोई... ख़ुद पस-ए-पर्दा रहो, धूल बहुत उड़ती है, अपनी ठोकर से कहीं ख़ाक उड़ा दे कोई, सांस तरतीब से आ जाये के इतना तो रहे, दर्द क्या कम है के कुछ और हवा दे कोई, उर्मिला माधव..

मुहब्बत को निभाने में

मुहब्बत को निभाने में न जाने खो गया क्या-क्या, जुदाई बाद वो जाने के आख़िर ,हो गया क्या-क्या.. जहाँ वाले मिरी तस्वीर का रुख़ देखते भी क्यूँ, कहाँ ज़ाहिर किया मैंने के मेरा रो गया क्या-क्या ... जो माज़ी लिख रही थी आज तक भी,ज़िन्दगी मेरी, कहीं जब आसमां रोया,वो तेरा धो गया क्या-क्या... उर्मिला माधव..

माहपारे दरअख्शां बहुत ख़ूब है

माहपार-ए-दरख्शां बहुत खूब है,  प्यार मेरा मगर तुमसे मंसूब है, जानना है ज़रूरी सुनो दीदा वर,  बा-वफाई मुहब्बत का उस्लूब है  आफरीं-आफरीं मेरा दीवाना पन, लोग कहते हैं वो देखो मज्जूब है, आशिक़ी का सिला मर्हबा,मर्हबा, कैसे झुठलायेगे गर ये मक्तूब है, तार दामन के देखेंगे बिखरे अगर, लोग कहते फिरेंगे कि मत्लूब है, आशिक़ी को है दरक़ार जिंदादिली,  जीतेजी मर गया,वो जो मग्लूब है,  उर्मिला माधव... माहपार-ए-दरख्शां---उगता हुआ चाँद , दीदावर------देखने वाले, उस्लूब---आचरण  आफरीं--- वाह-वाह .. मज्जूब---देखने में पागल लेकिन परमहंस  मक्तूब--- लिखा हुआ, मत्लूब---प्रेमी, मग्लूब---ओंधा गिरा हुआ...

सनम जाना है

सांस को इकदिन थम जाना है, यही तो सब से कम जाना है, यहीं रहेंगी महल अटारी, नहीं ख़ुशी नहीं ग़म जाना है, कितनी आंख निचोड़ी हमने, कहां किसी ने नम जाना है  तू ही सबका सच्चा साँईं, हमने आज सनम जाना है  उर्मिला माधव 

फ़ितनागर है,हुस्न

फ़ितनागर है,हुस्न तो फिर कीजियेगा क्या जनाब, लाइए अब ढूंढकर कुछ आप भी इसका जवाब, हुस्न का अपना चलन है,जो है ला-परवाह खूब, आप खुद समझें,कहीं हो आप ही कुछ बा-सराब, हाकिम-ओ-हुक्काम अपनी राह चलते हैं सभी, हुस्न भी रस्ता चलेगा बे नक़ाब-ओ-बा-नक़ाब,  लोग दस्तर खान सा,समझा किये हैं हुस्न को, आप दानिशमंद हैं तो...मत रखें मंशा खराब, आख़िरश तो हुस्न भी होगा किसी दम बा-जलाल, क्या समझ पाए कहें सब....बात का लब ए-लुवाब... उर्मिला माधव