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Showing posts from October, 2023

बीनाई नहीं

आँख है पर क्या करें बीनाई तो पायी नहीं, बात बढ़के हसरत-ए-दीदार तक आई नहीं, आँख से परदे हटाके,दिल की जानिब देखले, इस तरह गर्दन झुकानी क्यूँ तुझे आई नहीं?? तार दामन के बचाता है अबस ही बे खबर, इश्क़ में दीवाना होना....कोई रुसवाई नहीं, जो तू मिलना चाहता है,दिलनशीं महबूब से, सर झुका कुर्बान होजा.....वरना शैदाई नहीं, है अनल-हक़ देख तो नज़रें घुमा कर चार सू आज अनहद बज रहा है क्या वो शहनाई नहीं? उर्मिला माधव... २१.१०.२०१३.

उम्र भर

मुश्किलों के वास्ते दामन बचा है मुख़्तसर, और दामन भी कहाँ तक साथ देता उम्र भर,

सफ़र है

ये कैसा सफ़र है इधर ना उधर है, मगर इक सफ़र है ये दुनियां ये दीवार, पत्थर की सीढ़ी, यहीं इस जहां में मेरा एक घर है, इधर का उधर है, ये कैसा सफ़र है उर्मिला माधव

याद सुहानी निकली

रात के ख़्वाब से इक याद सुहानी निकली, सोचने बैठे तो एक ख़ास निशानी निकली, ख़ुद को छोड़ा था कहीं प्यास को दरिया करते, जिस्म लगता था नया,प्यास पुरानी निकली, माह-ओ-अख़्तर भी अंधेरों के तले सोया किये, हम तो अहमक ही रहे, रात सयानी निकली, उसने एक ख़ास बदन देके हमें भेज दिया, यूँ ही दम भरते रहे, ज़ीस्त भी फ़ानी निकली, हमने मुश्किल को बहोत पास से देखा, परखा, वो मगर बन के मिरी आंख से पानी निकली... उर्मिला माधव