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Showing posts from March, 2023

तब न अब

वो समझता था कि उसका कोई भी सानी नहीं, ज़िन्दगी है नोहख़्वानी तब समझता था न अब, वो कहीं पर देखता पर हम उसीको देखते थे, आंसुओं का सुर्ख़ पानी तब समझता था न अब

हो गई हूं

मैं ख़ुद से गुज़र कर नई हो गई हूं, सो ख़ुद के मुक़ाबिल खड़ी हो गई हूं, मैं इतनी मशक़्क़त से गुज़री हूँ आख़िर मुहब्बत की ख़ुद रौशनी हो गई हूं, ज़माने से लड़ना जो आया है मुझको, तो ये मत समझना बड़ी हो गई हूं, मगर ये भी सच है ग़लतियां बहुत थीं, सो अब थोड़ी-थोड़ी सही हो गई हूं, जो हो पारसा, बढ़ के आगे को आए, मैं गंगा सी पावन नदी हो गई हूं, उर्मिला माधव 18.3.2018

तमाम रात

शकील बदायूंनी की ज़मीन पर, हमने किसीकी याद में काटी तमाम रात, यूंही तड़प तड़प के गुज़ारी तमाम रात दीवारो दर के आसरे, नाहक़ चले गए, तन्हा थे आंसुओं में बितादी तमाम रात... उर्मिला माधव

तुमसे

बड़ी अजीब सी वहशत है क्या कहूँ तुमसे, अभी ख़याल है कि बहुत दूर ही रहूं तुमसे,

खोये हुए

एक मुद्दत हुई है सोये हुए, यूं ही बैठे हुए हैं खोये हुए, लोग मिलते ही पूछ देते हैं, आप लगते हैं ख़ूब रोए हुए, आप शिकवा फ़िज़ूल करते हैं, जिस्म के दाग़ तो हैं धोये हुए, उर्मिला माधव

दिल में हुजूमे ग़म

दिल में हुजूम-ए-ग़म है बयाँ हो तो कैसे हो? कुल ज़िन्दग़ी का दर्द अयाँ हो तो कैसे हो ? अब ज़िन्दग़ी में वैसी हसानत नहीं रही ख़ाली है जब ज़हन ये ग़ुमाँ हो तो कैसे हो? मुर्दार हो चुके हैं इबादत के वलवले, ऐसे में कोई रक्स-ए-समाँ हो तो कैसे हो?..... उर्मिला माधव.

असीरी के सबब

इक पतंगा जब मुहब्बत के सबब, लौ की ज़द में आ गया बस जां ब-लब, जाने उसके जी में आख़िर क्या रहा, बस ज़ुबां से रट रहा था रब ही रब, रात गहराई तो दिल में डर गया, अब चले पहुंचेंगे जाने कब के कब? रौशनी देखी तो चल कर आ गया, ढूंढता फिरता था जो शहर ए तरब उर्मिला माधव