मैं ख़ुद से गुज़र कर नई हो गई हूं, सो ख़ुद के मुक़ाबिल खड़ी हो गई हूं, मैं इतनी मशक़्क़त से गुज़री हूँ आख़िर मुहब्बत की ख़ुद रौशनी हो गई हूं, ज़माने से लड़ना जो आया है मुझको, तो ये मत समझना बड़ी हो गई हूं, मगर ये भी सच है ग़लतियां बहुत थीं, सो अब थोड़ी-थोड़ी सही हो गई हूं, जो हो पारसा, बढ़ के आगे को आए, मैं गंगा सी पावन नदी हो गई हूं, उर्मिला माधव 18.3.2018