दह्र में हम हादसों की मार से थक जाते हैं, झूट ही हो प्यार तो उस प्यार से थक जाते हैं लफ़्ज़ हों झूटे अगर, ग़मख़्वार से थक जाते हैं
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Showing posts from November, 2022
कहानी होगई
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मौत की जब मेजबानी होगई, ज़िन्दगी की तर्जुमानी होगई, जो हकीक़त थी अभी तक रु-ब-रु, टुक पलक झपकी कहानी होगई, सांस जब तक थी तभी तक गुफ्तगू, दफअतन ही बे-जुबानी होगई, क्यूँ ये दुनिया रोज़ लगती है नई, जबकि ये सदियों पुरानी होगई , जिनके चर्चे ज़िन्दगी मैं आम थे, बात उनकी आनी-जानी हो गयी, उर्मिला माधव.. १७.११.२०१३..
देख ना
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मेरे साक़ी शोखिये रिन्दाना आकर देख ना, बे-अदब हाथों में है पैमाना,आकर देख ना,.... रंग-ए-महफिल देखने के वास्ते ही आ ज़रा, हर सलीकेमंद का चिल्लाना,आकर देख ना, हर कोई मैकश का जामा ओढ़ कर झूमे यहाँ, मुख़्तसर,गिरता हुआ दीवाना,आकर देखना, हर अदावत में अदाकारी की है बस इन्तेहा, एक लम्हा ही सही पर आना,आकर देख ना, शैख़ है या है बिरहमन,जानना मुश्किल हुआ, कौन कितना होगया मस्ताना,आकर देखना, उर्मिला माधव... 17.11.201...
चलता रहा
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मिलना-जुलना, आना-जाना उम्र भर चलता रहा, एक रिश्ता दरमयाना उम्र भर चलता रहा, कब कहाँ क्या क्या न गुज़रा याद हो आता था बस, जब हर इक क़िस्सा पुराना उम्र भर चलता रहा, वक़्त रुक के देख लेता जब भी हम गिनते थे ग़म जोड़ बाक़ी और घटाना उम्र भर चलता रहा, कब कहाँ रुकना है इसको कौन जाना है कभी, ज़िन्दगी का ताना-बाना उम्र भर चलता रहा,
सब्ज़ शजर देखा है
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कितनी हैरत है गिरा,सब्ज़ शजर देखा है, वक़्त-ए-मुश्किल में बहुत खूब क़हर देखा है, चश्म-ए-गिरियाँ का अँधेरा ही रहा आठ पहर, किस से ये कहते फ़क़त दर्द-ए-जिगर देखा है, यूँ तो नाज़ुक था,यही कहते सुने अहले नज़र, जम के पत्थर से लड़ा......ऐसा गुहर देखा है, घर बहुत जलते रहे,अब्र कहीं बरसा किया, ऐसा मंज़र भी कभी वक़्त-ए-सहर देखा है, दिल को होता ही नहीं इसका यकीं,कैसे कहें फिर भी ये कहते रहे लोग.....मगर देखा है, चढ़ते दरिया में भी रफ़्तार मुक़म्मल ही रही, हमने कश्ती को बिना खौफ़-ओ-ख़तर देखा है, उर्मिला माधव... 24.1.2014..