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Showing posts from June, 2022

क़ाबिल हो गए

हम अकेले कितने क़ाबिल हो गए !! इतने सारे ग़म जो हासिल हो गए !! वक़्त किसको था के देखें और सुनें, सब के सब आके,मुक़ाबिल हो गए, बा-अदब कुदरत ने भी की दुश्मनी, हादसे हर चन्द शामिल हो गए, सामने लश्कर में आये लोग सब, हर तरह से हम ही बातिल हो गए, बोलना हमने कभी जाना नहीं, सो ब-खुद ही अपने क़ातिल हो गए, मुश्किलों में जो न थे शामिल कभी, बस दुआ देकर ही आदिल हो गए .... #उर्मिलामाधव... 8.9.2015

शामिल नहीं हूँ मैं कहीं

आपकी फ़हरिस्त में शामिल नहीं हूँ मैं कहीं, हां मगर इतना तो है हाइल नहीं हूँ मैं कहीं, आपकी तहज़ीब से वाबस्ता मैं हरगिज़ नहीं, पर समझ लीजे मुझे जाहिल नहीं हूँ मैं कहीं, आपकी रंगीनियां कितनी भी हों पुरज़ोर पर, देखती सब कुछ हूं पर माइल नहीं हूँ मैं कहीं, उर्मिला माधव

क़ुर्बान होगए

तिरछी नज़र की धार पे क़ुर्बान हो गए, यूँ दिल की खुदकुशी पे पशेमान हो गए, अपने मिजाज़ में तो कभी आशिक़ी न थी,  पर ऐसा कुछ हुआ के परेशान हो गए, अंदाज़ अपनी रूह के बस ज्यों के त्यों रहे हम ही जूनून-ए-इश्क़ का सामान हो गए, वो याद हमको आये तो मुश्किल गुज़र गई  हम ख़ुद भी अपने आप से बईमान हो गए फिर यूँ हुआ के रूह से हमने लड़ाई की, एक रोज़ उनके घर गए,मेहमान हो गए.. दुनियां को दरकिनार भी हमने किया बहुत ज़िंदान-ए-इश्क़ क्या हुए सुल्तान हो गए उर्मिला माधव

उतर भी नहीं जाता

क्या शख़्स है कि दिल से उतर भी नहीं जाता, उस पर ये मिरा दिल है कि मर भी नहीं जाता, बर्बादियों में पल के जो आबाद हुआ हो, दुनियां के किसी ग़म से बिखर भी नहीं जाता। उर्मिला माधव

ख़ुश हुए

हम जिसे अपना समझ कर ख़ुश हुए वो हमें अदना समझ कर ख़ुश हए  हमने आंखें खोल कर देखा जिसे वो हमें सपना समझ कर ख़ुश हुए,

निकल तो रही हूँ मैं

देहल से अपने घर की निकल तो रही हूँ मैं, शाना- ब-शाना आपके चल तो रही हूँ मैं, शमशीर-ओ-तीर लेके भला क्या करोगे तुम? तंज़-ओ-गुरूर देख के जल तो रही हूँ मैं, बज़्म-ए-जहाँ में आई हूँ पर बेख़बर् नही, अपने ही ग़म में रोके संभल तो रही हूँ मैं, अब तज़किरा करूँ भी किसी ग़ैर पै तो क्यों, आब-ओ-हवा के सांचे में ढल तो रही हूँ मैं, मेरी मुख़ालफ़त में हवा तक खिलाफ है, बे-फ़िक़्र होक फिर भी टहल तो रही हूँ मैं... #उर्मिलामाधव... 16.6.2015

आओ कभी

तुम ज़मीं पर,उतर के आओ कभी, अपनी जानिब नज़र घुमाओ कभी, तुम तो खुश फ़हमियों में जीते हो, अपनी कुछ ख़ामियाँ गिनाओ कभी  जिसको देखा बुरा कहा उसको, खुद पै भी उँगलियाँ उठाओ कभी, बस निगेटिव ख़याल रखते हो, ज़िन्दगी पौज़ीटिव बनाओ कभी, ज़ह्र बातों में घोल रखते हो, लफ़्ज़ शीरीं ज़रा मिलाओ कभी, बातें अपनी गरज़ की करते हो, अय ज़रा दिल भी तो मिलाओ कभी,  #उर्मिलामाधव... 16.6.2015

उधार करते हैं

ग़ज़ल ------ ज़ख्म-ए-दुनियां का ग़म छुपाने को वक्ती लम्हा उधार करते हैं,  जिससे तक़लीफ दिल को होती है,वो ही हम बार-बार करते हैं.... सबको मालूम है ये ग़म क्या है,ऐसे रस्ते का पेच-ओ-ख़म क्या है, दर्द-ए-दिल क्या है,क्या है ख़ामोशी फिर भी सब प्यार-प्यार करते हैं, जाने कैसी ये अब रिवायत है,बस मुहब्बत ही इनकी आयत है, क़ैस-ओ-लैला की तर्जुमानी बन,अपने दामन को तार करते हैं, कुछ ही लम्हों की ज़िंदगानी है,सब ही वाक़िफ़ हैं के ये फ़ानी है, झूठे लम्हों की ख़ैर ख़्वाही में अपनी इज्ज़त को ख़्वार करते हैं, हर मुहब्बत को सिर्फ हामी है,ये ही इंसानी दिल की ख़ामी है, अच्छी ख़ासी हसीन दुनिया को अपनी तबियत से दार करते हैं.... उर्मिला माधव.... 12.6.2017