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Showing posts from September, 2021

ढोलक की थाप

ढोलक की थाप, सोहर गाने की आवाज़, किन्नरों के  समूह का नृत्य, पर थाप से उठती हुई  उदासी की परछाइयां, देख सकती हूं मैं,दूर तक, क्या है ये? हतप्रभ होता हुआ मन, ढोलक की आवाज़ में नीरवता की झलक, क्या है ये ? भय लगता है मुझे, अपनी अनुभूतियों से, विचित्र दिव्य दृष्टि है, जो केवल सुनाई देना चाहिए, वो क्यों देता है दिखाई, आकुल-व्याकुल से मुख, परिलक्षित होते से, विचित्र दृश्य, क्या है ये ? आंधकार से घिरी सी हवाएं, किसीके द्वार का एक किवाड़, हवा में आगे पीछे को झूलता हुआ, देता है दिखाई, क्या है ये ? अंतिम सांस लेती हुईं, सीढ़ियों पर पदचाप, समस्त कोलाहल का अंत, बुद्धम, शरणम, गच्छामि.. उर्मिला माधव, 29.9.2017

लड़कपन की दुनियां

बुरी हो या अच्छी,लड़कपन की दुनियां, बहोत याद आती है,बचपन की दुनियां, वो खड़िया से आँगन में ख़ाने बनाना, ऑ गिट्टी से उस पर निशाने लगाना, बस एक पाँव से ही मगर चलके जाना, कभी जीत जाना,कभी रो के आना, नहीं फ़िक़्र कोई,फ़क़त मन की दुनियां, बहोत याद आती है बचपन की दुनियां, वो अम्मा की साड़ी से गुड़िया बनाई ऑ गुड़िया के माथे पै बिंदिया लगाई जमा करके .....चूड़ी के टूटे से टुकड़े बहुत हसरतों से वो ...गुड़िया सजाई वो गुड़िया के चूल्हे ऑ बरतन की दुनियां बहोत याद आती है बचपन की दुनियां.. सभी अपने लगते,गली,घर ऑ आँगन, कोई ख़ान मामा.....कोई चाचा जुम्मन, सभी एक से थे,.....मुसलमां, बिरहमन, जो बच्चों का रखते,हरिक हाल में मन, ग़ज़ब थी निराली वो ठनगन की दुनियां, बहोत याद आती है बचपन की दुनियां, वो ऊंची सी दीवार,ईंटों की गलियां, जहाँ मिलके खेले कभी गुइयाँ-गुइयाँ वो मीरा,वो मृदुला,बड़ी मालती थी, मगर मुझको प्यारी थी बहना की बहियाँ न देखी कभी फ़िक़्र-ओ-उलझन की दुनिया बहोत याद आती है बचपन की दुनियां... उर्मिला माधव..

बता कर दिए गए

ऐसा नहीं के हमको .....बता कर दिए गए, देना था कुछ सो ग़म ही अता कर दिए गए, बरसों से आंसुओं से जिन्हें लिख रहे थे हम, वो ख़त मुग़ालते में ख़ता कर दिए गए, हैरत न हमको कुछ भी हुई ख़ाक देख कर, रंजो अलम भी दिल को जता कर दिए गए, तख़लीक़ हमको जिसने किया, उसका शुक्रिया, तूफां भी ज़िन्दगी को सता कर दिए गए आइंदा ज़िंदगी का भरम भी बना रहा, अंजाम हर ख़ुशी के धता कर दिए गए, उर्मिला माधव

ज़िन्दगी गुज़ार दी

आंसुओं के साथ मैने,ज़िंदग़ी गुज़ार दी, वक़्त की बला उतारी,सोज़े-ए-ग़म पै वार दी, बेबसी ऑ बेकसी में बेख़ुदी का आसरा, जब हुई ज़ियादती तो मग्ज़ से उतार दी.. किसलिए क़ुबूल हों दह्र तेरी नेमतें, कहीं कोई ख़ुशी मिली तो हाथ से बुहार दी, रास्ते बिखर गए तो होंठ अपने सीं लिए पर तड़प के रूह ने सदा भी बार-बार दी यूँ भी तो जिया है इसको बाज़ियों की शक्ल में, ज़िंदग़ी जुआ लगी तो ज़िंदग़ी भी हार दी, उर्मिला माधव... 22.9.2017

नज़्म--- कभी मेरी आना

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, मगर वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , तो ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, उर्मिला माधव
सूरत ए हाल तो ये है कि कोई हाल नहीं, ज़िन्दगी हो न हो इसका कोई मलाल नहीं

हम कितने

ज़िंदगी कम है और सितम कितने, ये तो बतला कि कम से कम कितने। इक मुकम्मल हिसाब क्या होगा? राह कितनी है और ख़म कितने। हमको ये भी ख़याल क्योंकर हो? दुन्या कितनी है और हम कितने। उर्मिला माधव

मुक़ाबिल कौन है

ढूंढिए इस शह्र में अब किसको हासिल कौन है  और ज़रा बतलाइये किसके मुक़ाबिल कौन है मैंने मीज़ानों से पूछा,ताक़ पर रख कर ज़मीर अपनी इन बर्बादियों में और शामिल कौन है खुद हवाले करके जिसने,कश्तियाँ तूफ़ान में बादबां से जाके पूछा मेरा साहिल कौन है, ये नसीमे ख़ारो ख़स किसने जलाया आग में आबशारों ने ये सोचा ,इतना जाहिल कौन है, बर्फ़ का सीना पिघल कर एक दरिया हो गया, कौन ठहरा था यहाँ पर,इतना माइल कौन है, उर्मिला माधव

रू ए बिस्मिल से निकल

चल दफ़ा हो बेबसी अब रू-ए-बिस्मिल से निकल, मुझको सुनना कुछ नहीं है बस मेरे दिल से निकल, तयशुदा है, वक़्त के गिरदाब में घिरना ही है, इसलिए ख़ुद रास्ता चुन, बच के साहिल से निकल, सोच मत चढ़ना शुरू कर सीढियां मत कर शुमार मंज़िलें फिर और भी हैं पहली मंज़िल से निकल, देख मत हर सम्त मुड़ कर हौसला गिर जाएगा, छोड़ दामन बेकसी का, ज़ह्न-ए-जाहिल से निकल, दह्र की मायूसियां चलने न देंगी इक क़दम, उठ खड़ा हो ज़िंदा हो जा, ग़म के हाइल से निकल, उर्मिला माधव, 6.9.2018