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Showing posts from February, 2021

ताक़ पर

क्या कहें हालात को, तहज़ीब रक्खी ताक़ पर, रंग में कालक मिलाई और घुमाया चाक़ पर  दिल में लाखों मैल लेकर,दिल मिलाने आगये, बे-हयाई का चलन है समझें हैं बेबाक़ पर.... अब वो रंगा-रंग जैसा होलियों का रंग कहाँ, रंग थे होली के गाढ़े,दिल बहुत शफ्फाक़,पर .... वो सुरीले फाग के रंग वो मुग़न्नी अब कहाँ, कौन है बाक़ी मुनक़्क़ीद,ख्वाहिशे,मुश्ताक़ पर, लोग जो जीते थे,ज़ात-ए-किब्रिया के वास्ते, जान दे जाते हैं आख़िर अब हुजूम-ए- शाक़ पर.... #उर्मिला माधव.... 24.2.2015.... शाक़--- मुश्किल  मुनक़्क़ीद---कद्रदान  मुश्ताक़-----अभिलाषी,उत्सुक मुग़न्नी----- गायक

याद इतना आ रहा है

कौन मुझको याद इतना आ रहा है, वक़्त फिर से रतजगा,दोहरा रहा है, नींद आँखों से उड़ी जाती है मेरी, और अँधेरा,इस क़दर,गहरा रहा है, ये जो है सैलाब मेरे आंसुओं का, मेरे दिल को बे-वफ़ा ठहरा रहा है, डूबता दिल और मिरी ख़ामोश आहें, उम्र भर उलझन भरा चेहरा रहा है, खुशनुमां हो रौशनी खुर्शीद की प, मेरे दिल में इक फ़क़त सहरा रहा है, कैसे दिल का हाल कोई जान पाए, क्योंकि दिल पर ही अजब पहरा रहा है, उर्मिला माधव। .... 23 .2.2017

मुखौटे

कितने मुखौटे लेके जीते हैं, ज़ख्म सींते है, आंसू पीते हैं, खूब हँसते हैं, मन में रीते हैं, कैसी-कैसी, दुहाई देते हैं, हर तरह ढूंढते, सुभीते हैं, सांस रूकती है, फिर भी जीते हैं, तुम भी जीते हो, हम भी जीते हैं, बात इतनी है, बस फजीते हैं... उर्मिला माधव... 22.2.2014...

वाह वाह करते रहे

लोग सब वाह-वाह करते रहे, हम हज़ारों गुनाह करते रहे, जैसे भी हो सका जहां भर में, इक मुहब्बत की चाह करते रहे, रोने वालों को सबने रोने दिया, अपने जीने की राह करते रहे, रोने-धोने से क्या गुज़र होती, ज़िन्दगी ख़्वाब गाह करते रहे, सच्ची खुशियां कहाँ मयस्सर थीं, सिर्फ़ ग़म से निबाह करते रहे,   अपनी दुनियां बुलंद करने को, ख़ुद से ख़ुद ही सलाह करते रहे, तेरी दुनियां के सारे तुर्रम खां, देख कर,आह-आह करते रहे, उर्मिला माधव... 7.10.2015

राह में

एक दिन मुझको मिला था राह में  जिसको मैने रख लिया था चाह में, दिल शिकन है मुझको ये अहसास था, कुछ नज़र की ही नहीं आगाह में, मुस्कुराना रफ़्त में रख्खा ज़रूर, ग़म तो ज़ाहिर हो गया इक आह में, ख़ाब पर अब मुनहसिर है ज़िन्दगी, हम कहाँ शामिल हुए उस ब्याह में, उर्मिला माधव

भीग के घर जाते हैं

हम जो बारिश में कभी भीग के घर जाते हैं, यक़ता आँखों की चमक देख के डर जाते हैं, आईना देखें नहीं,इतनी क़सम दी खुद को,  लाख़ बचते हैं मगर फिर भी उधर जाते हैं,  हमने लोगों से कभी कोई भी शिकवा न किया, अपनी आहट से मगर, लोग बिखर जाते हैं, हमको अंदाज़ ख़बर इसका कभी हो न सका, किसकी चाहत के कहीं ख़्वाब से मर जाते हैं, ग़म की रफ़्तार तो ठहरेगी नहीं, ज़ाहिर है, चलते-चलते ही कहीं, हम ही ठहर जाते हैं.... #उर्मिला माधव.... 22.2.2015...

राबितों के उसने जो मानी

राबितों के उसने जो मानी हमें समझा दिए, दिल के टुकड़े करके हमने क़ब्र में दफ़ना दिए, नाख़ुदा उसको कहा ऑ हो गए हम ख़ुद हक़ीर, हमने अपनी सोहबत के हौसले दिखला दिए, क्या कमी थी बंदगी में ये बता बंदानवाज़, तूने जो इलज़ाम के तोहफ़े हमें पकड़ा दिए तंग इतनी हो गई झोली तेरी परवर दिगार, हैफ़,इज़्ज़त के जनाज़े पाँव से ठुकरा दिए, तेरी चौखट पर झुके है,इसके ये मानी नहीं, गम के शोले जिसने चाहा ज़ीस्त में भड़का दिए, हम न बदलेंगे कभी ये अपना शाहाना मिज़ाज सुन सरे महफ़िल इरादे हमने।भी बतला दिए... उर्मिला माधव..

नज़्म

एक छोटी सी नज़्म ... यही तो बात है सईयो, ...हमें झुकना नहीं आता, अगर हम सर झुकाते तो हमारी जां निकल जाती, तो फिर जीने के क्या मानी, कहानी ही बदल जाती, हमें तसलीम करने का .......सलीक़ा ही नहीं आया, अगर आता तो हर मुमकिन, तबीयत भी संभल जाती, उर्मिला माधव

उसकी दुनिया में मेरा दिल ये दुबारा न गया

एक वो दश्त जिसे छोड़ दिया जलते हुए, बस गया वक़्त हुआ,फिर से गुज़ारा न गया

कहानी...अम्मा

रोज़ाना सुबह नींद टूट जाती थी, अम्मा के भजन गाने की आवाज़ से, आज नींद नहीं टूटी शायद अम्मा गा नहीं रही थीं, मुझे लगा कि शायद मैं सुन नहीं सका। ख़ैर बिस्तर से उठना तो था ही सो उठ गया लेकिन जो देखा वो हृदय विदारक था, 3 बजे उठ जाने वाली अम्मा अभी तक सोई हुई थीं मुझे बहुत आश्चर्य हुआ तो मैं अम्मा को उठाने गया, लेकिन अम्मा सो गई थीं कभी न उठने के लिए और मैं खड़ा रह गया मौन विस्मृत, हर बात अम्मा से साझा करता था लेकिन ये बात किससे साझा करता सो फ़ैसला किया, परवरदिगार से कहने का, मैं बोला, तुम तो जानते थे न मेरी तो केवल अम्मा ही थी, तुम्हारी तरह मेरे पास पूरी दुनिया थोड़े ही थी, मैं 18 साल का लड़का क्या करूंगा और कुछ भी करूंगा तो अम्मा तो नहीं तो नहीं देखेंगी न, घर वाले(दादी बाबा, नानी नाना और दुनियां भर के लोग) तो कभी मेरे साथ नहीं थे, अम्मा को कभी किसीका ज़िक्र करते नहीं सुना था सो वो लोग कैसे थे, मैं नहीं जानता था ।।       अम्मा किसी डिग्री कॉलेज में प्रोफ़ेसर थीं, सो उनको अच्छी तनख़ाह मिलती थी, कभी आर्थिक संकट जाना नहीं क्या उनकी सेविंग थी मुझे नहीं पता था, लेकिन पास पड़ोस में मेरी अम्मा...