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Showing posts from December, 2020

उतर आया

ज़रा सी बात थी वो झूठ पर उतर आया, बला का सच था बड़ी दूर तक नज़र आया, ज़ुबां को बंद रखा मैंने कुछ कहा ही नहीं, तो सारी उम्र मिरी ज़ीस्त पर असर आया... वो एक रंग महज़ जिसकी मुझको आदत थी, सो मेरे हिस्से वही ग़म का इक सफ़र आया, वो जिसके टूट के गिरने से डर रहे थे सभी, कमाल ये कि उसी शाख़ पर समर आया, Zara si baat thi wo jhuth par utar aaya, Balaa ka sach tha, badi door tak nazar aaya, ZubaaN ko band rakha maine kuchh kaha hi nahin, To saari umr meri zeest par asar aayaa, Wo ek rang mahaz jiski hmujhko aadat thi, So mere. Hisse wahi gham ka ik safar aayaa.. Wo jiske tuut ke girne se dar rahe the sabhi, Kamaal ye ke usi shaakh pe samar aayaa.... Urmila Madhav

तुमने क्या किया

एक बार फिर... --------------- तुमको पसंद हमने किया तुमने क्या किया?? दिल को बुलंद हमने किया तुमने क्या किया?? तनहाइयों में रोया किये.......ज़ार-ज़ार खूब, दिल दर्द मंद हमने किया तुमने क्या किया?? तुमने तवज्जो हम पे किसी तौर जब न की, दिल दस्त-बंद हमने किया तुमने क्या किया ?? उर्मिला माधव ... १५.९.२०१३

मौसम

कड़कड़ाती ठण्ड है और हर कोई मफ़लर लपेटे, चाय में गुड और अदरक उफ़ मसालों दार मौसम... :: Kadkadaati thand hai or har koi muffler  lapete, Chay men gud or adrak,uff masalon daar mausam एक मतला---एक शेर --- दिल-जिगर को लूट लेगा ये हवाओं दार मौसम, दिल से इस्तक़बाल है तू आ हज़ारों बार मौसम, :: Dil-jigar ko loot lega ye hawaon daar mausam, Dil se istaqbal hai,tu aa hazaron baar mausam.. कड़कड़ाती ठण्ड है और हर कोई मफ़लर लपेटे, चाय में गुड और अदरक उफ़ मसालों दार मौसम... :: Kadkadaati thand hai or har koi muffler lapete, Chay men gud or adrak,uff masalon daar mausam #उर्मिलामाधव, 9.12.2015

जाहिल हो गई

आपसे जब ये मुकाबिल हो गई,  जिंदगानी और मुश्किल हो गई, चुपके-चुपके रोना,कहना कुछ नहीं, एक नई ख़ूबी ये हासिल हो गई, किस तरह तय होंगी इतनी दूरियां, चलते-चलते रूह बिस्मिल हो गई,  आपकी हो दीद,ये ख्वाहिश शदीद, जाने कब से मुझमें शामिल हो गई  तंज़ करती इश्क़ की ताबीर पर,  देख लीजे दुनियां,जाहिल हो गई.... उर्मिला माधव

झाइयां

आँख के नीचे की काली झाइयां, और सारी उम्र की तन्हाईयाँ  घेरती हैं अब सवालों से मुझे, आज गुज़रे वक़्त की परछाईयाँ, यूँ भी कहते ही नहीं बनता है कुछ,  जब ये मुझमें खोजें हैं रानाईयाँ, जो भी गुज़रा हो मगर इतना रहा, ज़िन्दगी ने नाप लीं गहराइयाँ , पाँव तो हर दम ज़मीं पर ही रहे  चश्म-ए-नम से देख लीं ऊँचाइयाँ, दिल मेरा अनहद कहीं सुनता रहा  दूर कुछ बजती रहीं शहनाइयां , उर्मिला माधव

ज़ख़्म ताज़ा ही है, भरा तो नहीं

ज़ख़्म ताज़ा ही है,भरा तो नहीं, हादसा ये भी कुछ नया तो नहीं, दिल को आदत है,याद रखने की, आपसे फिर भी कुछ कहा तो नहीं, चश्म-ए-गिरया ने आँख धो डाली, क्या हुआ इसमें कुछ गया तो नहीं, जो भी हो मुद्दआ तो ख़त्म हुआ, इसके आगे का सिलसिला तो नहीं, आख़री वक़्त है,गिला क्यों हो ? हौसला अब भी है मरा तो नहीं उर्मिला माधव.. 9.12.2016