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Showing posts from October, 2020

सरहाने रख रही हूँ

एक मतला दो शेर --- मैं किताबें अब सरहाने रख रही हूं, चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं, हर वरक संजीदगी के नाम है, एक माज़ी सोलह आने रख रही हूं, इक तजुर्बों का पुलिंदा,हर नफ़स, ज़िन्दगी के ताने-बाने रख रही हूँ, कुछ अंधेरे और दिए बुझने की राख़ और धुंए के कुछ ख़ज़ाने रख रही हूँ, गोकि एहसास-ए-घुटन हलका न हो, बंद करके,कुछ दहाने रख रही हूं,  जिस की दम पे दिन गिने हैं उम्र भर, अपनी तस्वीही के दाने रख रही हूँ, एक खनक आहों के हिस्से की भी है, सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं, उर्मिला माधव, 28.10.2017

रायगां

इक हुजूमे-ए-दुश्मनां, सामने है रायगां, उफ़ मुहब्बत के लिए !! किस क़दर हैं बदगुमां, जिसने बख़्शी ज़िन्दगी, वो ही देगा सायबां, खुद-ब-खुद करना सभी, कौन किसपे मेहरबां, वक़्त देखा बदतरीन, था सभी कुछ तो निहां....   किसलिए हो फ़िक्र तब, ये बताओ जान-ए-जां, उर्मिला माधव.... 26.10.2016... Ik hujoom-e-dushmanaN, Saamne hai raygaN, Uf muhabbat ke liye, Kis qadar hai badgumaN, Jisne bakhshi zindagi, Wo hii dega saybaN, Khud-b-khud karna sabhi, Kaun kispe meharbaN, Waqt dekha badtar een, Tha sabhi kuchh to nihaN, Kis liye ho fiqr tab, Ye batao jan-e-jaN, Urmila Madhav

डरी हुई थी

दिलों में नफ़रत भरी हुई थी, मैं दुश्मनों से डरी हुई थी, यही समझने में दिन गए सब, के चोट फिर से हरी हुई थी, जिसे ख़ुशी हम समझ रहे थे, वो जाने कब की मरी हुई थी, नहीं असीरी,मुझे मुआफ़िक, मैं अपनी ज़िद से बरी हुई थी, वो अपनी दुनियां बचा रही हूँ, जो मुश्किलों से खरी हुई थी, उर्मिला माधव,

जहां शाम गुज़री थी हिज्र में

जहां शाम गुज़री थी हिज्र में, वहीं रात आके ठहर गई, भला हश्र इसका रहेगा क्या, जो उधेड़बुन में सहर गई, यहां पथ्थरों के मज़ार हैं, यही आशिक़ों के वक़ार हैं, नहीं कोई अहले दयार हैं, हद-ए-राह तक तो नज़र गई, न तो बेमिसाल है ज़िन्दगी, न कमाल इसमें कहीं कोई, कहीं मौत ने जो पकड़ लिया तो ये लौट के भी न घर गई.. मिरी ज़िन्दगानी का तर्जुमा, न हुआ न कोई समझ सका, रहे आम पर ये चली मगर रहे आम से भी गुज़र गई.. कहीं इसमें रंगे जमाल है, कहीं आबरू पे ज़वाल है, कभी ख़ाहिशों के दयार में न ये चाहती थी, मगर गई,

अकारण ही

क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को, स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को, हर नदी की संधि है,सागर के तट पर, ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को, जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े, कौन कर पाया है,मर्यादित प्रलय को ? प्रेम की अभिव्यक्ति हो निर्मल हृदय से, तब कहाँ सीमाएं,अनुमोदित प्रणय को ? हम स्वयम प्रहरी हैं अपनी भावना के, और नहीं तोड़ेंगे, अनुबंधित वलय को, उर्मिला माधव, 8.10.2017

मीरा दीवानी ख़ूब है

कुल जहां में जानी मानी ये कहानी खूब है, साथ  मोहन के ये प्यारी राधा रानी खूब है, हैं बसे मुरली की तानों में मधुर मोहन के रंग, उसपे गलियों में किलकती राज रानी खूब है, जो कोई जिस रंग में सोचे मिले वैसा ही रंग, प्यार के रंग में रंगी  ये ....राजधानी खूब है, तान सुन के डमरू वाले भी यूँ माइल होगये, क्या कहें भोले की हस्ती पानी-पानी खूब है, एक महलों वाली रानी होश से गफ़िल हुई, सब मिसालों में बड़ी मीरा दिवानी खूब है..... उर्मिला माधव... 7.10.2017

दफ़ा हो गए हैं

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े, ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं, सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं, मुहब्बत के मानी बचे ही कहाँ कुछ, फ़क़त अब ज़ियाँ और नफ़ा हो गए हैं....  वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना, किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं, #उर्मिलामाधव... 5.10.2015

नज़्म हवेली

ग़ज़ब खूबसूरत थी अपनी हवेली, इसी में छुपी है हमारी सहेली, कभी इसकी ख्वाहिश हवाओं में उड़ना, दरख्तों की शाखों पै चढ़ना उतरना, हवाओं की सरगम पे गाना ठुमकना ऑ नदिया की हलचल पे जी भर मचलना  इरादों से नापें ज़मीं आसमां सब, किसी एक पल में, न जाने कहाँ कब? ये ऐसी सहेली है थकती नहीं है, बहुत मुश्किलों में भी रुकती नहीं है, उर्मिला माधव

बनारस की गलियां

मौसिक़ी की शान, बनारस की गलियां, उल्फ़त का उन्वान, बनारस की गलियां, जो भी आता यहीं का होके रह जाता, हर दिल का ज़िन्दान, बनारस की गलियां, बिस्मिल्लह जी आप हमें क्यूं छोड़ गए, कर डालीं वीरान बनारस की गलियां, मणिकर्णिका घाट हक़ीक़त कहता है, करती हैं कल्यान बनारस की गलियां, जल्वे काशी विश्वनाथ के ज़ाहिर हैं, शिव का हैं वरदान बनारस की गलियां, कोई नज़ारा कहाँ बचा इन गलियों से, पूरा हिंदुस्तान बनारस की गलियां उर्मिला माधव