रब से मिला देता था
जलते लफ़्ज़ों से बहुत ख़ूब सिला देता था,
हाँ मगर ये है...मुझे रब से मिला देता था,
उसकी चाहत में बहुत दूर तलक जाती थी,
वो मुझे ज़ह्र-ए-जुबां दिल से पिला देता था,
मैं तो बस ये के .....तग़ाफ़ुल को हवा देती थी,
दिल की बुनियाद मगर फिर भी हिला देता था,
मैं यतीमों में, ...नहीं पैदा हुई, ....अच्छा हुआ,
उसको ग़फ़लत ही रही,मुझको जिला देता था,
उसकी तबियत पे रहा,ज़िक्रे वफ़ा हो के न हो,
हाँ नए ज़ख्म मगर ........रोज़ खिला देता था.
उर्मिला माधव..
10.12.2015
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