सोज़-ए-ग़म पे वार दी

आंसुओं के साथ मैने,ज़िंदग़ी गुज़ार दी,
वक़्त की बला उतारी,सोज़े-ए-ग़म पै वार दी,

बेबसी ऑ बेकसी में बेख़ुदी का आसरा,
जब हुई ज़ियादती तो मग्ज़ से उतार दी..

किसलिए क़ुबूल हों ये दह्र की नियामतें,
कहीं कोई ख़ुशी मिली तो हाथ से बुहार दी,

रास्ते बिखर गए तो होंठ अपने सीं लिए
पर तड़प के रूह ने सदा भी बार-बार दी

यूँ भी तो जिया है इसको बाज़ियों की शक्ल में,
ज़िंदग़ी जुआ लगी तो ज़िंदग़ी भी हार दी,
उर्मिला माधव...
22.9.2016

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