ग़ज़ल
एक जब बिछड़ा है,दूजा आएगा ही,
और जो आया है वो भी जाएगा ही,
मन न मैला कर मुसफिर, रास्ता है,
एक दो ठोकर तो यूँ भी खायेगा ही,
उठ भी जा होजा खड़ा पैरों पै अब,
चल, अँधेरा और भी गहराएगा ही,
क्या मज़ाक ए हुस्न है इनसान का,
साँस है जब तक, अबस इतरायेगा ही,
भूलना खुद को है फितरत-ए-बशर,
कोई तो फिर रास्ता बतलायेगा ही
उर्मिला माधव ...
23 .1 .2017
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