ग़ज़ल

अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में,बाख़ुदा कोई नहीं,
जो भी कुछ थे आप थे बस,दूसरा कोई नहीं,

कितने लम्बे रास्ते तनहा किये तय उम्र भर,
सबका इस्तकबाल था पर नाख़ुदा कोई नहीं,

सब अकेले ही उठाते अपनी वीरानी का बार,
कुल दह्ऱ का ये चलन है,बांटता कोई नहीं,

रोज़-ए-महशर सामने है और खड़े हैं रु-ब-रु,
इसकी मंजिल इन्तेहा है इब्तेदा कोई नहीं,

आह भी याहू की जौलानी सी लगती है मुझे,
इसलिए अब उससे बढ़कर या खुदा कोई नहीं,
उर्मिला माधव
15 .1 .2017

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