ग़ज़ल

कितनी हैरत है गिरा,सब्ज़ शजर देखा है,
वक़्त-ए-मुश्किल में बहुत खूब क़हर देखा है,

चश्म-ए-गिरियाँ का अँधेरा ही रहा आठ पहर,
किस से ये कहते फ़क़त दर्द-ए-जिगर देखा है,

यूँ तो नाज़ुक था,यही कहते सुने अहले नज़र,
जम के पत्थर से लड़ा......ऐसा गुहर देखा है,

घर बहुत जलते रहे,अब्र कहीं बरसा किया,
ऐसा मंज़र भी कभी वक़्त-ए-सहर देखा है,

दिल को होता ही नहीं इसका यकीं,कैसे कहें
फिर भी ये कहते रहे लोग.....मगर देखा है,

चढ़ते दरिया में भी रफ़्तार मुक़म्मल ही रही,
हमने कश्ती को बिना खौफ़-ओ-ख़तर देखा है,
उर्मिला माधव...
24.1.2014..

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