ग़ज़ल

तनहा खड़ी रही मैं समंदर के बीच में,
तूफ़ान मुश्किलों के बवंडर के बीच में,

ताने गए जो मेरी शिकस्तों के वास्ते,
कम फासले थे मेरे ऑ खंजर के बीच में,

ताक़ीद ये हुई थी के हंसना है अब हराम,
रहना है उम्र भर यूँ ही बंजर के बीच में,

घर कह रहे थे सब जिसे वो घर कहाँ रहा,
कुछ दूरियां थीं मेरे ऑ अंदर के बीच में,

बातों की तर्ज़ हो गई यलगार की तरहा,
मदफन की शक्ल हो गई मंदर के.बीच में,

अब मैं थी और थीं मेरी मजबूरियां तमाम,
गोया कि जुर्रतें हों सिकंदर के बीच में.....
#Urmila
22.1.2015

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