एक मतला दो शेर

ज़िन्दगी तुझसे मैं नाराज़ भी हो सकती हूँ,
ख़ुद-ब-ख़ुद मरने को तैयार भी हो सकती हूँ,

चाहे जितना भी निबाहा हो तिरे साथ मगर,
एक इनसान हूँ हस्सास भी हो सकती हूँ,

दिन निकलते ही जो मैं जिस्म से उठ जाती हूँ,
अपनी तबियत से कोई रात भी हो सकती हूँ,
उर्मिला माधव

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