ग़ज़ल

सिर्फ़ हंसने को बहाना चाहती हूँ,
मैं कहाँ सबको हंसाना चाहती हूँ,

गर उमड़ आए समंदर अश्क़ का,
तब मैं तनहाई में जाना चाहती हूँ,

ग़ैर के कांधे की तालिब किसलिए,
बार अपना ख़ुद उठाना चाहती हूँ,

मैंने कब साझा किया है ग़म कहीं,
राह अपनी ख़ुद बनाना चाहती हूँ,

कोई हँस के बोल ले तो ठीक है,
वर्ना घर को लौट जाना चाहती हूँ..

हर हक़ीक़त जानती हूँ दह्र की,
इसलिए दामन बचाना चाहती हूँ,
उर्मिला माधव
23.1.2018

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