6 लाइन्स
गहरे ज़ख़्मों पे चोट खाते हैं,
अहले दिल यूँ ही मुसकुराते हैं,
ग़ुज़रे शामो सहर किसी तरहा,
रात होते ही टूट जाते हैं,
दर्दे क़ुरबत से रू-ब-रू होकर,
चश्मे ग़िरियाँ में डूब जाते हैं उर्मिला माधव..
२४.१.२०१३
गहरे ज़ख़्मों पे चोट खाते हैं,
अहले दिल यूँ ही मुसकुराते हैं,
ग़ुज़रे शामो सहर किसी तरहा,
रात होते ही टूट जाते हैं,
दर्दे क़ुरबत से रू-ब-रू होकर,
चश्मे ग़िरियाँ में डूब जाते हैं उर्मिला माधव..
२४.१.२०१३
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