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Showing posts from September, 2017

कासा नहीं रखती

ज़रूरतमंद हूँ लेकिन कोई कासा नही रखती, इरादा जो भी रखती हूं कभी आधा नहीं रखती, मेरी आवाज़ का हिस्सा फ़लक तक भी पहुंचता है, जो कहती हूँ बुलंदी से,ज़ुबाँ सादा नहीं रखती, मेरे खूँ में तो नाफ़रमानियाँ, शामिल नहीं हरगिज़, मगर इल्ज़ाम है सर पर, के ये वादा नहीं रखती, अभी कुछ ज़ख़्म रिसते हैं,अभी कुछ वक्त बाक़ी है, ये ग़म बहने का ज़रिया हैं तो मैं फ़ाहा नहीं रखती, मुझे भी क़ब्र तक ले जाएगी बादे सबा इक दिन इसी डर से मैं अपनी रूह पे साया नहीं रखती उर्मिला माधव, 30.8.2017

अहले ग़म हैं पर्दा दारी रखते हैं

अहले ग़म हैं,पर्दा दारी रखते हैं, मर जाने की सब तैयारी रखते हैं, ग़ालिब हो जाना ही ऊंची बात नहीं, अपनी दम पर हम ख़ुद्दारी रखते हैं, कोई रहबरी नहीं चाहिए दुनियां की, कोई शख़्स हो दूर की यारी रखते हैं, आज मुहब्बत लफ़्फ़ाज़ी का नाम हुआ, बेमतलब की सब बीमारी रखते हैं, बचते हैं हम कान बुरीदह लोगों से, सब दामन में तीर कटारी रखते हैं, उर्मिला माधव  1.9.2017

जिसपे दुनियां को पसीना आ गया

जिसपे दुनियां को पसीना आ गया, मुझको आसानी से जीना आ गया, है अजब सा वाक़या पर सच भी है, ग़ैर के ज़ख्मों को सींना आ गया, मेरी आँखों में अजब तासीर थी, चल के साहिल पे सफ़ीना आ गया, लोग छाती पीट कर क्यूँ रो गये क्या मोहर्रम का महीना आ गया? ज़िन्दगी पाकर सभी यूँ खुश हुए, जैसे हाथों में नगीना आ गया... जब से देखा शाम-ए-हश्र-ए-आफ़ताब, बस के तबियत में करीना आ गया.. उर्मिला माधव, 2.9.2017

सिंदूर की डिब्बी

बाज़ार में मात्र चार रुपयों की आती है, वो सिंदूर की डिब्बी, जो बाबू ने मेरे लिए लाखों रुपयों में खरीदी थी, सिंदूर की डिब्बी और  जीवन भर की गुलामी का अनुबंध, मुझसे वो घर भी छीना था जिसे मैं अपना समझने की भूल करती रही थी, जहाँ अम्मा थीं,स्नेह शीला, एक सिंदूर की डिब्बी ने उनको भी छीना था, पराई हो जाने का ठप्पा लगाया गया था मेरे ऊपर , जहाँ से आई थी वो मेरा घर नहीं था, जहाँ आई थी वो पराया घर था, बचपन ने यही सुना कर जवानी पर धकेला था,तुम्हें पराये घर जाना है, मेरा मन कभी समझ नहीं पाया, कौन सा घर पराया था ? अम्मा वाला या सिंदूर की डिब्बी वाला ? कितनी बड़ी हो गई हूँ, पर ये दोहरा विषय अभी तक समझ में नहीं आया, मुझे लगता है औरत का कोई घर ही नहीं होता उसकी अपनी कोई पहचान होती ही नहीं यदि है भी तो एक औरत सिर्फ एक औरत, # उर्मिलामाधव

हम सितारों तक पहुंच भी जाएंगे तो क्या करेंगे

हम सितारों तक पहुँच भी जायेंगे तो क्या करेंगे, अपनी खातिर कौनसा फिर रास्ता हम वा करेंगे, उसके आगे ख्वाहिशें ही सिर्फ उड़ कर जा सकेंगी, ग़र ज़ियादः बढ़ गईं तो ,उससे भी तौबा करेंगे, ज़िन्दगी की आपा-धापी और अलहदा सा चलन, इससे तो बेहतर है"अपने आप" को सजदा करेंगे, कौन इस दुनिया में कुछ भी दे सका है ये बताओ, दिल को सब पामाल करके बस मज़ा लूटा करेंगे, जिसको देखो खुद को ही यकता समझता है यहाँ, जो समझता है वो समझे हम समझ कर क्या करेंगे... उर्मिला माधव... 6.9.2017

एक एहसास था जो मर सा गया

एक एहसास था जो मर सा गया, दिल ये हस्सास था सिहर सा गया, बेश कीमत था एक मरासिम जो, हाँ बहुत ख़ास था जिगर सा गया, हम समझते थे उसको नूर-ए-नज़र, उसका एक पास था गुज़र सा गया, सिर्फ़ ग़फ़लत थी इक मसर्रत की, ग़म भरा लिबास था,उतर सा गया, उसको अब कौन कहने जाता है, रेत की प्यास था,बिखर सा गया... उर्मिला माधव 7.9.2017..

जब तुमसे हम मिले थे हमें होश ही न था

जब तुमसे हम मिले थे हमें होश ही न था, अब सोचते हैं,क्या वो मुलाक़ात सच में थी ? तुम याद कुछ दिलाओ हमें,हम कहाँ रहे, कोइ बात भी हुई थी वहां?किसके हक़ में थी ? उर्मिला माधव.... 8.9.2016

ग़म नमूदार हुए जाते हैं

ग़म नमूदार हुए जाते हैं, हम बहुत ख़्वार हुए जाते हैं, बर्क दुनियां पै गिर गई देखो, दर भी सब दार हुए जाते हैं, कांच का घर है तीरगी के तले, वक़्त की हार हुए जाते हैं, हाथ को हाथ नहीं दिखता है, और क़दम बार हुए जाते हैं, बस सहारे हैं इन हवाओं के, जिससे कुछ पार हुए जाते हैं उर्मिला माधव... 9.9.2017