कासा नहीं रखती
ज़रूरतमंद हूँ लेकिन कोई कासा नही रखती, इरादा जो भी रखती हूं कभी आधा नहीं रखती, मेरी आवाज़ का हिस्सा फ़लक तक भी पहुंचता है, जो कहती हूँ बुलंदी से,ज़ुबाँ सादा नहीं रखती, मेरे खूँ में तो नाफ़रमानियाँ, शामिल नहीं हरगिज़, मगर इल्ज़ाम है सर पर, के ये वादा नहीं रखती, अभी कुछ ज़ख़्म रिसते हैं,अभी कुछ वक्त बाक़ी है, ये ग़म बहने का ज़रिया हैं तो मैं फ़ाहा नहीं रखती, मुझे भी क़ब्र तक ले जाएगी बादे सबा इक दिन इसी डर से मैं अपनी रूह पे साया नहीं रखती उर्मिला माधव, 30.8.2017