जनाब राहत इन्दौरी जी के शेर पर फिल्बदीह में लिखे गए अशआर... ------ जो मुतमईन नहीं थे मेरे इंतजाम से, चर्चे हज़ार करते रहे.....मेरे नाम से, दिल में चुभन हुई तो मेरा रुख बदल गया, मैंने नवाज़ डाला उन्हें ख़ाली जाम से, आखिर मुझे भी हक था कहीं ऐसा कुछ करूँ, कुछ तो निजात पाऊं,ज़रा गम की शाम से, कहते थे लोग मुझको बहुत ख़ूब मेजबान, करदीं गुज़ारिशात हर इक ख़ास-ओ-आम से, कैसा ख़ुलूस,कैसा अदब,कैसी इल्तिज़ा, चिलमन गिराके बचती रही एहतिराम से, अजदाद पुर ख़ुलूस रहे,उम्र भर जनाब, इज्ज़त जुड़ी हुई थी,बहुत इस कयाम से, गैरत कचोटती थी मुझे दिल ही दिल में ख़ूब, शर्मिंदा ज़िंदगी थी बहुत अपने काम से, -------------------------------------------------- jo mutmaiin nahin the mere intzaam se, charche hazaar karte rahe mere naam se, dil men chubhan huii to meraa rukh badal gayaa, maine navaaz daalaa unhen,khaalii jaam se , aakhir mujhe bhii haq tha,kahin aisaa kuchh karun, kuchh to nijaat paaun zaraa gam kii shaam se, kahte the log mujhko bahut khoob mejbaan, kardiin guzarishaat har ik khaas-o-aam se, k...