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Showing posts from August, 2017

उसने पूछा भी नहीं,मैंने बताया भी नहीं

उसने पूछा भी नहीं,मैंने बताया भी नहीं, वक़्त-ए-रुख़सत वो मुझे देखने आया भी नहीं, आंखें झपकीं न गईं मुझ से बहुत देर तलक, लोग ग़फ़लत में रहे,जिस्म उठाया भी नहीं... आगया फिर वो निभाने को यूं ही रस्म-ए-चराग़, कांपती लौ को हवाओं से बचाया भी नहीं, उर्मिला माधव, 12.8.2017

जिनके होठों पे अब भी ताले हैं

जाने कैसे मिज़ाज वाले हैं, जिनके होठों पे अब भी ताले हैं, जिसने सेहरा में रौशनी देखी, अपनी किस्मत से वो निराले हैं पूछना अपने घर की बेटी से, कितने अनचाहे ग़म सम्हाले हैं, हव्वा आदम की बेटी रोती है, क्या ये इंसाफ़ करने वाले हैं? जब से जन्मे हैं तब से देखा है, हम "तिरंगे की शान" वाले हैं, मुल्क के रहबरों ये बतलाओ, क्यूँ रिआया के झंडे काले हैं ? क्यूँ रिआया के झंडे काले हैं ?.. # उर्मिलामाधव ... 14.8.2015

दास्तां हिंदुस्तान की

दास्तां हम गा रहे हैं ख़ूब ....हिंदुस्तान की, किसलिए पुर सोज़ है फिर रूह हिंदुस्तान की , हर दरीचे पर लिखी हैं दर्द और दुश्वारियां, ग़म ज़दा क्यूँ हो गई ख़ातून हिंदुस्तान की, यौमे आज़ादी का दिन है कह रहे हैं मरहबा कर गई ग़ारत सभी को फूट हिंदुस्तान की, हिल नहीं सकती कभी बुनियाद इसकी दोस्तों, पायदारी हो अगर मजबूत हिंदुस्तान की, उर्मिला माधव, 14.8.2017

डूबते सूरज की समझे नातवानी तो मैं जानूँ

डूबते सूरज की समझे नातवानी तो मैं जानूँ। और अपनी छोड़ दे ये हुक्मरानी तो मैं जानूँ। बादशाहत के नशे में चल रहा है झूम कर तू बिन नशे के जी ज़रा ये ज़िंदगानी तो मैं जानूँ। हो गए गद्दीनशीं तो मार दी दुनिया को ठोकर सरहदों पर झोंक दे अपनी जवानी तो मैं जानूँ। ग़ैर मुल्कों में उड़ी हैं धज्जियाँ अपने वतन की चिंदियों पर लिख कोई अच्छी कहानी तो मैं जानूँ। ख़्वाब देना आसमाँ के, कौनसी खूबी है इसमें दे ज़रा अपने वतन को कुछ निशानी तो मैं जानूँ उर्मिला माधव... 15.8.2014

मेरे नाम से

जनाब राहत इन्दौरी जी के शेर पर फिल्बदीह में लिखे गए अशआर... ------ जो मुतमईन नहीं थे मेरे इंतजाम से, चर्चे हज़ार करते रहे.....मेरे नाम से, दिल में चुभन हुई तो मेरा रुख बदल गया, मैंने नवाज़ डाला उन्हें ख़ाली जाम से, आखिर मुझे भी हक था कहीं ऐसा कुछ करूँ, कुछ तो निजात पाऊं,ज़रा गम की शाम से, कहते थे लोग मुझको बहुत ख़ूब मेजबान, करदीं गुज़ारिशात हर इक ख़ास-ओ-आम से, कैसा ख़ुलूस,कैसा अदब,कैसी इल्तिज़ा, चिलमन गिराके बचती रही एहतिराम से, अजदाद पुर ख़ुलूस रहे,उम्र भर जनाब, इज्ज़त जुड़ी हुई थी,बहुत इस कयाम से, गैरत कचोटती थी मुझे दिल ही दिल में ख़ूब, शर्मिंदा ज़िंदगी थी बहुत अपने काम से, -------------------------------------------------- jo mutmaiin nahin the mere intzaam se, charche hazaar karte rahe mere naam se, dil men chubhan huii to meraa rukh badal gayaa, maine navaaz daalaa unhen,khaalii jaam se , aakhir mujhe bhii haq tha,kahin aisaa kuchh karun, kuchh to nijaat paaun zaraa gam kii shaam se, kahte the log mujhko bahut khoob mejbaan, kardiin guzarishaat har ik khaas-o-aam se, k...

कितनी रखती है गुंजाइश

हिलती नहीं धसक जाती है,कितनी रखती है गुंजाइश, रहे सलामत ज़मीं जहां में,यही है बस रब से फरमाइश, कहीं कोई जागीर बसाये,.....कोई सियासी रंग जमाये, हर दिन मकीं लड़ा करते हैं,जगह-जगह करते पैमाइश, गिनती जिनको याद न होगी,आज़ादी के परवानों की, वही ठसक से गिनवा देंगे,अपनी पुश्तों की पैदाइश, मुर्दा दिल क्या ख़ाक लड़ेंगे,वतन परस्ती के जज़्बे से, वतन के शाहिद परवानों की याद नहीं,जिनको आराइश, हिन्द के बच्चे आशुफ़्ता हैं,दुनियांदारी बोझ है इनको, कौन मुहैय्या करवाएगा,इनके दिल को भी आसाइश्... उर्मिला माधव 15.8.2017

हर मंज़र मुझे

इस क़दर भारी पड़ा, दुनियां का हर मंज़र मुझे, दश्त सा लगने लगा मेरा ही अपना घर मुझे, हादसों की हर नफ़स बरपा हुईं सर गर्मियां, क्या बताऊँ किस क़दर लगने लगा था डर मुझे, ग़र ख़ुशी को वक़्त कम था ,ग़म भी तो मसरूफ़ थे, अब बचा इक चैन जो दरकार था ,पल भर मुझे, यक़-ब-यक़ हंगामा-ए-ग़म, ख़ुद में पिन्हा कर गया, कर दिया घबराहटों ने बद से भी बदतर मुझे, उर्मिला माधव।। 17 .8 .2017 

बे परवाहियां

दिल ने लीं अब ओढ़ बे-परवाहियाँ, रूठ जाए रब .....या रूठे माहियां, वक़्त वो कुछ और था सुनिये ज़रा जब डराती थीं हमें ......तन्हाईयाँ, ख़ुद अकेले ....माद्दा रखते हैं हम, क्या बिगाडेंगी ये अब रुसवाइयां, देख पाए जो न एक बारात तक, वो बजायें आजकल शहनाईयां, जिनकी आधी बात में भी दम नहीं, नापते हैं दिल की ....वो गहराइयां ..... # उर्मिलामाधव ... 18.8.2017..