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Showing posts from December, 2023

दामन बचा लूं

सोचती हूँ तुझसे अब दामन बचा लूँ रुक ज़रा सा पहले अपना मन बनालूँ,

न पूछ

चार दीवारी की तनहाई न पूछ उम्र भर के ग़म की पैमाई न पूछ एक वो है और केवल वो ही वो, कब तू हो जाएगा शैदाई न पूछ.. उसका जलवा है नुमायां चार सू, मेरे सच्चे रब की रानाई न पूछ. जिसने बख़्शी है हमें दीदावरी, क्या कहूँ बस उसकी दानाई न पूछ. इश्क़ में दीवानगी ही शर्त है, होजा होजा, इसमें रुसवाई न पूछ.. उर्मिला माधव

सिला देता था

जलते लफ़्ज़ों से बहुत ख़ूब सिला देता था, हाँ मगर ये है...मुझे रब से मिला देता था,  :: jalte lafzon se......... bahut khoob sila deta tha, haan magar ye hai mujhe rab se mila deta tha, :: उसकी चाहत में बहुत दूर तलक जाती थी, वो मुझे ज़ह्र-ए-जुबां दिल से पिला देता था, :: uskii chaahat main bahut door talak jaatii thii, wo mujhe zahr-e-zubaan dil se pilaa deta tha, :: मैं तो बस ये के .....तग़ाफ़ुल को हवा देती थी, दिल की बुनियाद मगर फिर भी हिला देता था,  :: main to bas ye ke tagaaful ko hawa deti rahii dil kii buniyaad magar phir bhii hilaa detaa thaa, :: मैं यतीमों में, ...नहीं पैदा हुई, ....अच्छा हुआ, उसको ग़फ़लत ही रही,मुझको जिला देता था, :: main yatiimon men nahin paida hui achha hua, usko gaflat hii rahi.......mujhko jilaa detaa thaa, :: उसकी तबियत पे रहा,ज़िक्र-ए-वफ़ा हो के न हो, हाँ नए ज़ख्म मगर ............रोज़ खिला देता था... :: uski tabiyat pe rahaa,zikr-e-wafaa,ho ke na ho, haan naye zakhm magar,roz khilaa detaa thaa..... #उर्मिलामाधव.. 10.12.2015

सुनाते हुए

तीन शेर  अजीब हाल में रहने लगे थके से क़दम, मलाल दिल को रहा आबले छुपाते हुए.. कभी हुआ ही नहीं हमसे जिन ग़मों का हिसाब, ज़माना रोने लगा वो सफ़हे गिनाते हुए, जो चाहता था मिरी रूह से बातें करना, वो रो पड़ा था मुझे मर्सिया सुनाते हुए, उर्मिला माधव, 7.12 2017

ख़ुद ब ख़ुद

पैदा किया है आलमे तनहाई ख़ुद बख़ुद, देखी है हमने वहशते रुसवाई ख़ुद बख़ुद जो-जो हुआ है वो ही तो होना था दोस्तो, जब ज़िन्दगी के हो गए शैदाई ख़ुद बख़ुद, इक फ़ासले के साथ ही चलने की ज़िद हुई, मशहूर ख़ुद को कर दिया, हरजाई ख़ुद बख़ुद, बेलौस चलते-चलते भी डरने लगे थे हम, धड़कन हज़ार हादिसे ले आई ख़ुद बख़ुद, दानिशवरों की भीड़ का हुज्जूम इक तरफ़, हद-हद से बढ़ के आ गई दानाई ख़ुद बख़ुद, इस उम्र भर की दौड़ का हासिल था एक दिन, महशर के रोज़ बढ़ गई रानाई ख़ुद बख़ुद, उर्मिला माधव 7.12.3018

सजाना आता है

मुझको ग़म में ख़्वाब सजाना आता है, उल्फ़त का दस्तूर निभाना आता है, कोई साज़िश रचके रुसवा ख़ूब करे, आगे बढ़कर प्यार दिखाना आता है, फ़र्क़ समझना आजाता है पल भर में, हंस हंस के हर बात भुलाना आता है, चश्म-ए-गिरियाँ पलकों में ही रहते हैं, ग़म का हर सैलाब छुपाना आता है, तहज़ीबें महदूद मुझे कर देती हैं, मुझको भी सुर्ख़ाब उड़ाना आता है... उर्मिला माधव...