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Showing posts from April, 2023

चर्चे सुख़नबरी के

एक मजदूर की आवाज़.... नज़्म.. मैले कुचैले कपडे आँखों की इस नमी पर, ख़ाके उतारते हैं काग़ज़ की एक ज़मीं पर, तक़लीफ़ को हमारी,मौज़ू बना बना कर, उंगली चुभा रहे हैं,हालात की कमी पर, कैसे बताएं इनको,इनकी तरह हैं हम भी, मजदूर  हैं सही है,होते हैं हमको ग़म भी, क़ुर्बान करना छोडो अपनी बुलंदियों पर, ये ज़्यादती बड़ी है,किस्सा करो ये कम भी, मिल जायेंगे तख़ल्लुस तमगे भी दिलबरी के, इज्ज़त के ऊंचे मसनद,चर्चे सुख़न बरी के, नौटंकियाँ तुम्हारी तुम नाच लो कहीं पर, पर इससे क्या गरज है,लिखते हो सब हमीं पर, सुल्तान इस अहद के,हालात कुछ न बदले है आफरीं सियासत,इतिहास कुछ न बदले, उर्मिला माधव...

एक ही घर

जब कहा उसने कि 'जा मर, ये सुना और दिल गया भर, नईं बचा रस्ता कोई तब, लौट के बस आ गए घर, टिक गए कोने में जाकर, बे-हया दिल,अश्क़ लेकर, हट गयी उसकी तवज्जो, अब बचा बस एक ही दर, वो ही दर जो सबका दर है, सबको है मालूम वो घर... उर्मिला माधव ... 27.4.2014...

सूरत थी

हमको बचने की एक सूरत थी, गोकि इक प्यार की ज़रूरत थी,
दिल कैसा है, दुखते-दुखते थक जाता है, गिरते पड़ते ग़म के द्वारे तक जाता है

ताबिन्दा हैं हम

देखिए तनहा ही ताबिन्दा हैं हम, आपके बिन भी अभी ज़िंदा हैं हम, याद है कब आपसे बिछड़े थे हम, हम गुज़िश्ता कब हैं, आइंदा हैं हम अपने ही बल पर खड़े हैं आज तक, अपने ही दम से तो पाइंदा हैं हम, उर्मिला माधव

पड़ता है

हर इक के बिन सब कुछ ढोना पड़ता है, इस दुनियां में क्या-क्या खोना पड़ता है, हैरत है ये किसकी कारगुज़ारी है, जो काटा है, फिर फिर बोना पड़ता है, ख़ास मशक़्क़त करते हैं सब हंसने को, और यकायक, हंस के रोना पड़ता है, ख़ास मनाज़िर सामने आते रहते हैं, ख़ाली दिल को रोज़ भिगोना पड़ता है थक जाते हैं, लोग वजाहत देते हुए, मीज़ानों पे जब जब सोना पड़ता है उर्मिला माधव

सहना पड़ा

उम्र भर ग़म ही ग़म तो सहना पड़ा, थक गए, आख़िरश ये कहना पड़ा, अपनी मर्ज़ी की कुछ बिसात नहीं, उसकी ख़ाहिश के साथ रहना पड़ा, बुझती आंखों को बंद रखते हुए, ग़म के सैलाब संग बहना पड़ा, एक पल भी सुकून ओ चैन नहीं, गिरती दीवार जैसा ढहना पड़ा