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Showing posts from February, 2023

ख़ाब तो हो

सबसे पहले दिल में कोई ख़ाब तो हो,   उसके भी पाने को दिल बेताब तो हो, अव्वल तो ये दुनियां मुश्किल लगती है, और ज़ुबाँ पर अपनी फिर आदाब तो हो, पिछली बातें इतनी चुभती रहती हैं, उनको गारत करने को सैलाब तो हो, देखके जिसको सर सजदे में झुक जाए, इस दुनियां में ऐसा कुछ नायाब तो हो, चाल ख़ता हो जाए, फिर हम उठ जाएं, जिस्म हमारा इतना सेहत् याब तो हो.. उर्मिला माधव
मुश्किलों के साथ चलना चाहिए, रात में भी दिन निकलना चाहिए, चांद दिन भर साथ ही चलता रहे, रात दिन सूरज को ढलना चाहिए

बीमार कर गए

उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए, ऐसा लगा कि ग़म का परस्तार कर गए दामन में सिर्फ खार हैं.....पैरों में आबले, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए, कुछ आरज़ू थी...कुछ थे इरादे बहुत बड़े, कुछ रास्ते के गम मुझे खुद्दार कर गए, सब लोग क्या कहेंगे......यही डर बहुत रहा, क्या-क्या सुनेंगे हम जो अगर हार कर गए, किसको अज़ीज़ होगी कहो ये अज़ल की राह, हम से ही सिर फिरे हैं...जिगर वार कर गए ...  उर्मिला माधव ... १४.९.२०१३

हसीन देखा

पहले से ख़्वाब हमने ज़्यादा हसीन देखा, जब धड़कनों को अपनी ताज़ा तरीन देखा, मुश्किल हुआ समझना,क्या ज़ेहन में लिखा है, जब शख्सियत को इतना ज़्यादः ज़हीन देखा, बारीकियां समझना,आसान तो नहीं था, जिस्म-ओ- जिगर पे होता चर्चा महीन देखा, कोई अहमियत न देखी जज़्बात की जहां में, हर लम्हा ज़िन्दगी को ,ऐसा मशीन देखा, हैरत में हर कोई था ये देख कर यक़ायक, मेहताब को ज़मी पर, परदा नशीन देखा, उर्मिला माधव, 30.6.2017

चिलमन दरूँ गिरा के किया

चिलमन दरूं गिरा के किया आपने गुनाह, इस बे-अदब अदा का भला क्या करेंगे आह !!, इन फ़ासलों के साथ ही चलना है गर हमें, किसकी करेंगे आरज़ू,किसकी तकेंगे राह, करने से पहले आपने सोचा तो होगा ख़ूब हरक़त को आफ़रीं है,अदावत की वाह-वाह !! इसके हुए मआनी के उल्फ़त हुयी तमाम, अब देखनी है आपकी बदली हुयी निगाह, हमको किया अमीर भी इफ़रात से जनाब, रख्खेंगे अब सहेज के ये आह और कराह,  उर्मिला माधव...

दुनियां में सिंहासन की

दुनियां में जब होड़ मची सिंहासन की, हमकूँ फिकिर लगी है चौका बासन की, जब जी चाहे, बैठौ, मन में राम भजौ चाहत का करनी है कुस(कुशा) के आसन की.. सब ते पहलें उठ कें घर कौ काम करौ, याद सम्हारौ मन में विघ्न बिनासन की, जब जोरन ते हवा चली ढह जानों सब, दुनियां खालिस महल बनी है तासन की.. याद करौ बिन देस के बीर जवानन की, युद्ध करौ और रोटी खाई घासन की.. उर्मिला माधव

जिनको ग़ुरूर-ए-फ़न है

जिनको ग़ुरूर-ए-फ़न है ख़ताबार हैं सभी, कुल क़ायनात के वो गुनहगार हैं सभी, जो ज़िन्दगी से ज़िन्दगी को हारकर चले, वो अपनी ज़िन्दगी के सितमगार हैं सभी, इन्सानियत की रूह से जो प्यार कर सके, वो अपनी शख़्सियत से मिलनसार हैं सभी, जिनका फ़रेब-ओ-मक्र में सानी न हो कोई, घर उनके जाके देख लो ग़मख़्वार हैं सभी, शह्र-ए-अमीर ख़ुद को समझना ही है फज़ूल, देखो तो दिल में झाँक के बीमार हैं सभी, हमदर्दियों के ये सभी,तालिब हैं अय हुज़ूर, बीमार हैं प ज़ीस्त के हक़दार हैं सभी, उर्मिला माधव 11.2.2017

जहां शाम गुज़री थी हिज्र में

जहां शाम गुज़री थी हिज्र में, वहीं रात आके ठहर गई, भला हश्र इसका रहेगा क्या, जो उधेड़बुन में सहर गई, यहां पथ्थरों के मज़ार हैं, यही आशिक़ों के वक़ार हैं, नहीं कोई अहले दयार हैं, हद-ए-राह तक तो नज़र गई, न तो बेमिसाल है ज़िन्दगी, न कमाल इसमें कहीं कोई, कहीं मौत ने जो पकड़ लिया तो ये लौट के भी न घर गई.. मिरी ज़िन्दगानी का तर्जुमा, न हुआ न कोई समझ सका, रहे आम पर ये चली मगर रहे आम से भी गुज़र गई.. कहीं इसमें रंगे जमाल है, कहीं आबरू पे ज़वाल है, कभी ख़ाहिशों के दयार में न ये चाहती थी, मगर गई, उर्मिला माधव

उम्र बिता देते हैं

लोग गफ़लत में बहुत उम्र बिता देते हैं, अपने जज़्बों को बहुत ख़ूब सज़ा देते हैं, हमसे दिलदार ही दुनियां में धुआं होके भी, खाक़ लेते हैं ज़मीं पर से, उड़ा देते हैं,  ग़म ख़ुशी,मौत दुआ और हजारों मसले,  कुछ भी लिखते हैं हथेली पै,मिटा देते हैं, बात का रंग,ज़ुबां शीरीं,शहद के माफ़िक, अपने लफ़्ज़ों में मिला कर ही दुआ देते हैं, वक़्त आता है जबीं छू के निकल जाता है, हम ज़माने को फ़क़त हंस के दिखा देते हैं, #उर्मिलामाधव ... 1.4.2015...

आह भी नहीं कहते

आह को आह भी नहीं कहते, इश्क़ को ज़िन्दगी नहीं कहते, दिल को महदूद रखना अच्छा है ग़ैर से ग़म कभी नहीं कहते, गुफ़्तगू में हज़ार ख़म निकलें, उसको हम सादगी नहीं कहते, गर चे है फ़िक़्र दीनो दुन्या की, उसको आवारगी नहीं कहते, अपनी तबियत में जो फ़क़ीरी है, इसको बेचारगी नहीं कहते, फ़र्क़ समझे जो रेत पानी का, उसको हम तिशनगी नहीं कहते, उर्मिला माधव

कासा नहीं रखती

ज़रूरतमंद हूँ लेकिन कोई कासा नही रखती, इरादा जो भी रखती हूं कभी आधा नहीं रखती, मेरी आवाज़ का हिस्सा फ़लक तक भी पहुंचता है, जो कहती हूँ बुलंदी से,ज़ुबाँ सादा नहीं रखती, मेरे खूँ में तो नाफ़रमानियाँ, शामिल नहीं हरगिज़, मगर इल्ज़ाम है सर पर, के ये वादा नहीं रखती, अभी कुछ ज़ख़्म रिसते हैं,अभी कुछ वक्त बाक़ी है, ये ग़म बहने का ज़रिया हैं तो मैं फ़ाहा नहीं रखती, मुझे भी क़ब्र तक ले जाएगी बादे सबा इक दिन इसी डर से मैं अपनी रूह पे साया नहीं रखती उर्मिला माधव, 30.8.2017

ग़म के हाइल से निकल

चल दफ़ा हो बेबसी अब रू-ए-बिस्मिल से निकल, मुझको सुनना कुछ नहीं है बस मेरे दिल से निकल, तयशुदा है, वक़्त के गिरदाब में घिरना ही है, इसलिए ख़ुद रास्ता चुन, बच के साहिल से निकल, सोच मत चढ़ना शुरू कर सीढियां मत कर शुमार मंज़िलें फिर और भी हैं पहली मंज़िल से निकल, देख मत हर सम्त मुड़ कर हौसला गिर जाएगा, छोड़ दामन बेकसी का, ज़ह्न-ए-जाहिल से निकल, दह्र की मायूसियां चलने न देंगी इक क़दम, उठ खड़ा हो ज़िंदा हो जा, ग़म के हाइल से निकल, उर्मिला माधव, 6.9.2018