बचते हैं
ख़ुद को शायर तो सब समझते हैं,
सच को कहने से...साफ़ बचते हैं,
ख़ुद की नज़रों में ख़ुद मेयारी हैं,
सातवें आसमां पै रहते हैं
बात लिखते भी हैं मुहब्बत की,
उसपे हाथों से मुंह को ढकते हैं,
अब कहो ये भी कोई बात हुई,
दिल में गर्द-ओ-ग़ुबार रखते हैं,
रु-ब-रु कोई जो कहे आकर,
अपनी नज़रों से बगलें तकते हैं,
जब भी मीज़ान पर वफ़ा तौली,
उस घड़ी कुफ़्र भी ये बकते हैं,
ख़ुद को ज़ाहिर करेंगे शाहाना ,
देखिये इनको जब बहकते हैं,
इनकी कमज़ोरियों पे कुछ भी कहें,
तब ये अंगार से दहकते हैं....
उर्मिला माधव...
28.5.2016...
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