मेरे दिल की किताब रहने दे, चुप ही रह हर जवाब रहने दे, चैन मिलना कोई ज़रूरी है ? ऐसा कर ,इज़्तराब रहने दे, आँख रोती हैं जा इन्हें ले जा, मेरे नज़दीक ख्वाब रहने दे, एक चिलमन बहुत है परदे को आने-जाने को बाब रहने दे, तुझको शम्स-ओ-क़मर से तौला था, अपनी इज़्ज़त की ताब रहने दे, तू है मजबूर अपनी आदत से छोड़ बाक़ी हिसाब रहने दे.. ख़ार ख़ुशबू से ख़ूब बेहतर हैं, ले जा अपने गुलाब रहने दे तेरी खुशियां तुझे मुबारक हों, मुझको ख़ाना ख़राब रहने दे,.... उर्मिला माधव.. 12.9.2016
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Showing posts from September, 2016
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किसी भी एक दिवसीय आयोजन के लिए समर्पित---- ख़ूब है हिंदी की गलियों का ये फेरा, एक दिन, भित्तियों पर चित्र भी जा कर उकेरा, एक दिन, हर कोई आतुर हुआ इंदौर जाने के लिए देख लेंगे उस शहर का एक सवेरा, एक दिन, देश के व्यवसायी जो अंग्रेज़ियत से चूर हैं, वो भी जायेंगे जमाएंगे ही डेरा,एक दिन, भारती चलचित्र की अभिव्यक्तियाँ हिंदी में हैं, लिखके रोमन में पढ़ेंगे देश मेरा, एक दिन.... क्या है वंदे मातरम्,ये पूछ कर देखो कभी, कस के देखो बस ज़रा हिंदी का घेरा एक दिन... तोड़ कर भागेंगे रस्सा और कहेंगे माय गॉड, भूल ही जाएंगे आख़िर तेरा-मेरा एक दिन... # उर्मिलामाधव 14.9.2016
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क्या कहूँ जुस्तजू को लिए सो गई, चांदनी उससे पहले ही गुम हो गई, यक़-ब-यक़ शोर काली घटा ने किया, गो कि परछाईं जाने कहाँ खो गई, गाहे-गाहे कड़कने लगीं बिजलियाँ, दिल धड़कने लगा ज़ोर से रो गई, नींद टूटी मेरी तो कहीं कुछ न था, बस ये ज़ाहिर हुआ के सुबह हो गई, जाने क्या बरसा था,रात बरसात में, कुल ज़माने की सब लज़्ज़तें धो गई.. उर्मिला माधव .. 17.9.2016
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:) एक मज़ाहिया ख़याल---- ------------------------------ ज़ुल्फ़ कांधों पै बिखराइये, बाद उसके इधर आइये , मुझसे कहने लगे दीदावर, चांदनी रुख पै ठहराइए, मुझको कहना पड़ा देखिये, मेरे रस्ते से हट जाइए मेरी फ़ितरत ज़रा फ़र्क है, ऐसा हरगिज़ न फरमाइए, फ़ासले मुझको दरक़ार हैं, चलत-फिरते नज़र आइये उर्मिला माधव... 22.9.2014.....
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आंसुओं के साथ मैने,ज़िंदग़ी गुज़ार दी, वक़्त की बला उतारी,सोज़े-ए-ग़म पै वार दी, बेबसी ऑ बेकसी में बेख़ुदी का आसरा, जब हुई ज़ियादती तो मग्ज़ से उतार दी.. किसलिए क़ुबूल हों ये दह्र की नियामतें, कहीं कोई ख़ुशी मिली तो हाथ से बुहार दी, रास्ते बिखर गए तो होंठ अपने सीं लिए पर तड़प के रूह ने सदा भी बार-बार दी यूँ भी तो जिया है इसको बाज़ियों की शक्ल में, ज़िंदग़ी जुआ लगी तो ज़िंदग़ी भी हार दी, उर्मिला माधव... 22.9.2016
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जब तूने दिल तोड़ा होगा, कैसे तुझको छोड़ा होगा, तनहाई में अक्सर जाकर, चौखट पै सर फोड़ा होगा, बाँयां हाथ जिगर पै रखकर, दिल का दर्द निचोड़ा होगा, चाहे जितना ग़म हो तुझको, मुझ से तो पर थोड़ा होगा, तुझे भुलाने की खातिर ही, खुद को खुद से जोड़ा होगा, दिल पर दाग़ लगाने वाले, तुझसा कौन निगोड़ा होगा..... उर्मिला माधव.... 25.9.2014....
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दो क़दम चलना है मुश्किल,इस क़दर पुर ख़ार हूँ, ये बता दे ज़िन्दगी क्या मैं बहुत दुश्वार हूँ ? क्या करूँ होता नहीं हरगिज़ ज़माने से निबाह, अपनी ज़ाती ज़िद को लेकर मैं बख़ुद बेज़ार हूँ, अपने दिल को तोड़ कर चलना कभी जायज़ नहीं, मैं भी तो अपनी तरह से जीने की हक़दार हूँ, मुझको तन्हाई में रहना रास आया है बहोत, है यही मुश्किल मेरी,बे-इन्तेहा ख़ुद्दार हूँ, ख़ुद परस्ती के मुताबिक,ग़म शनासाई भी है, इससे तो बेहतर है मुझको,ख़ुद-ब-ख़ुद ग़म ख़्वार हूँ, उर्मिला माधव.. 26.9.2016
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जंगली, जंजाल देखो, मकड़ियों के, जाल देखो, आदमी का, हाल देखो, लड़कियों के नाम पर, रोज़ इक वबाल देखो, इज़्ज़तों पे क़ाबिज़ हैं, माईयों के लाल देखो, उफ़ अगर जो करनी है, गर्दनें हलाल देखो, हक़ जो कह रहे हैं उनकी खिंच रही है,खाल देखो, उँगलियाँ उठाने को, ख़ुद-ब-ख़ुद बहाल देखो, जो अलिफ़ न सीख पाए, उनका दाल,ज़ाल देखो, रेप,सीना जोरी की, रोज़ एक मिसाल देखो, देश के खिलाड़ियों को, हाय ख़स्ता हाल देखो जीत आईं ओलिम्पिक, उनका इस्तेमाल देखो, उसके आगे क्या होगा, ये है इक सवाल देखो, कुछ न मिलना,जाना है चेहरों पे मलाल देखो, सोचने का काम क्या है, बस यही हर साल देखो, उर्मिला माधव.. 19.9.2016
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आग ग़ैरों ने लगाई बोलो इसका क्या करें, हार कर बैठें के या फिर हौसला ज़िंदा करें, ये तो सच है ज़िन्दगी में साथ कोइ देता नहीं, ख़ुद-ब-ख़ुद उठ जाएँ ख़ुद ही रास्ता पूरा करें, ज़िन्दगी कुछ भी नहीं है एक सिवाए हादसा, फिर भी इन हालात से कुछ खूबियां पैदा करें, पाँव के छाले न देखें,ज़िन्दगी रख्खें रवाँ, ये न सोचें किसलिए अब रास्ता नापा करें, कौन यक़ता है यहाँ पर सब के सब हैं एक से, ख़ुद को अदना मान कर क्यूं दिल भला छोटा करें फ़र्ज़ को अंजाम देना है बहुत तरतीब से, हर नफ़स ही कीमती है वक़्त क्या ज़ाया करें.... उर्मिला माधव... 21.9.2016