फ़क़त रेशम सी गांठें थीं ज़रा सी खोल ली जातीं, जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था कोई दिल पर न लेजाये, कहीं कहने से पहले एहतियातन, तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से निभाना ही नहीं था तब, ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें ख़ुद मोल ली जातीं, फ़रेब-ओ-मक्र में फंसना-फंसाना शौक था जिनका, दरीचे झाँकने को तब ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को हुनर की क्या ज़रुरत थी, कि बस हाथों की तलवारें ज़ह्र में घोल ली जातीं... उर्मिला माधव