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Showing posts from February, 2024

बात बन जाए

तुम इतना बोझ सा क्यूँ लाद कर खड़े हो यहाँ, ज़रा सा खुल के जो हंस जाओ बात बन जाए, तुम्हारे सर प अभी कौनसी मुसीबत है, ज़रा सा खुल के बतादो तो बात बन जाए उर्मिला माधव

क्या होता है

एक मतला दो शेर----- हुए हज़ारों टुकड़े दिल के,और क़ह्र से क्या होता है?? हम मानिंन्द हुए मुर्दे के,और ज़ह्र से क्या होता है?? जिसकी हो जागीर हमेशा रहे उसी की मरते दम तक, कोई इस्तक़बाल कहे बस और शह्र से क्या होता है??  दीवारों से बने हुए हैं,ताजमहल और मंदिर मस्जिद, आमद-रफ्त बशर की क़ायम और दह्र से क्या होता है ?? उर्मिला माधव... 24.2.2014..

बदनाम सब

करने आए थे हमें बदनाम सब, कर नहीं पाए मगर ये काम सब, जो ये कहते थे खुदी को कर बुलंद, वो ही बैठे हैं जिगर को थाम सब, बेचने को आए हम भी ज़िन्दगी, कर गए साबित हमें बेदाम सब, अब सबीलों की दरारें बढ़ गयीं , घर भी करने आगये नीलाम सब, मेरी किस्मत का तमाशा क्या रहा, देखने को आ गए.......अंजाम सब.... उर्मिला माधव... 13.2.2016

बोल ली जातीं

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं ज़रा सी खोल ली जातीं, जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था कोई दिल पर न लेजाये, कहीं कहने से पहले एहतियातन, तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से निभाना ही नहीं था तब, ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें ख़ुद मोल ली जातीं, फ़रेब-ओ-मक्र में फंसना-फंसाना शौक था जिनका, दरीचे झाँकने को तब ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को हुनर की क्या ज़रुरत थी, कि बस हाथों की तलवारें ज़ह्र में घोल ली जातीं...  उर्मिला माधव

उंसियत होती नहीं है

उंसियत होती नहीं है अब किसी हालात से, इतनी नफ़रत हो गई है आदमी की ज़ात से, हर नए इनसान से अब कोफ़्त होती है हमें, दब गए हैं इस क़दर हम दर्द की इफ़रात से, इक नए अंदाज से आकर गले मिलते भी हैं, पर सभी किरदार हैं इक तीरगी की रात से, उर्मिला माधव.. 2.2.2017

नज़्म, इंतज़ार

इंतज़ार---- किसीको चाहत का, किसीको राहत का किसीको मुहब्बत का, किसीको इजाज़त का, किसीको बग़ावत का, इक छलांग ऊंचाइयों के लिए, एक छलांग गहराइयों के लिए, कहीं आराइयों के लिए कहीं शैदाइयों के लिए सीखना होगा शैदाई होना, ख़्वाब ख़ाने की ज़दों तक, मर जाने की हदों तक, उर्मिला माधव 2.1.2019

डराती रहती है

गुज़री दुनियां सामने आती रहती है, जाने क्या-क्या याद दिलाती रहती है, ये सब देख के दिल घबरा के चुप है बस, ग़म की ज़हमत रोज़ डराती रहती है उर्मिला माधव