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गई हूं मैं

कहीं भी राह में थक कर ठहर गई हूँ मैं कोई बताये के किस-किसके घर गई हूँ मैं, अजब अज़ाब था जो मेरी सम्त आया था, तमाम उम्र को ज़ख़्मों से भर गई हूँ मैं, मिरी हयात के अंजाम सब अधूरे हैं, यही मजाल है कोशिश तो कर गई हूँ मैं, एक इज़्तराब-ए-मुसलसल में वक़्त गुज़रा है, कभी न मुझको लगा यूँ के डर गई हूँ मैं, किया जो ज़ब्त तो मिजगां से ख़ून बह निकला, ये बस क़यास रहा सबको,मर गई हूँ मैं, हज़ार बार उबारा है मैंने ख़ुद को ख़ुद, यूँ ऐतक़ाफ़ में भी मुख़्तसर गई हूँ मैं, उर्मिला माधव.... 1.6.2016

तस्वीर के रुख़

देखते भी कब तलक तस्वीर के रुख़, आज़माने पड़ गए, तासीर के रुख़, हकबका कर देखते ही रह गए, उसके हाथों से लिखी, तक़दीर के रुख़, फंस गए हम वहशतों के जाल में, देखने जब पड़ गए जागीर के रुख़, हमको थीं अज़ादियों की चाहतें, जब समझने पड़ गए ज़ंजीर के रुख़, उर्मिला माधव