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Showing posts from September, 2022

नज़्म आदमी कुछ अजीब लगता था

आदमी कुछ अजीब लगता था, ज़िंदगी सा करीब लगता था, उन दिनों दिल का एक आलम था, मुश्किलों का असर ज़रा कम था , उसको देखे से चैन मिलता था, बस खुदा से वो ऐन मिलता था, अपनी दुनियाँ,बहार होती थी, आँख जब उससे चार होती थी उसने अपना चलन बदल डाला, मेरे दिल का चमन कुचल डाला, बाद उसके तो फिर ये होना था, अपने दामन को ही भिगोना था, यूँ सहर अब भी रोज़ होती है, उसकी आमद से खूब रोती है, दिल की कूव्वत जवाब देती है, उम्र भर का हिसाब लेती है... #उर्मिलामाधव... 28.9.2015

जाती नहीं

 मैं किसीको देखने जाती नहीं, पर किसीकी याद भी आती नहीं, ग़म, ख़ुशी जो भी हैं, मेरे साथ हैं, महफ़िलों में बात को लाती नहीं.. बात को महफ़िल में भी गाती नहीं,

बिछड़ने का शौक़

शौक़ है तुमको बिछड़ने का बहुत, लो तुम्हें आज़ाद कर देते हैं हम, जीते जी शायद ये मुमकिन हो न हो, ज़िन्दगी के बाद कर देते हैं हम, उर्मिला माधव

बाबूजी

क्या कल का अख़बार पढ़े हो बाबूजी ? दुनियां का व्यभिचार पढ़े हो बाबूजी? सच बतलाना,क्या-क्या पढ़के आए हो, इक कमसिन की हार पढ़े हो बाबूजी ? दिन भर कोरी बातें करते फिरते हैं, कुल दुनियां बीमार पढ़े हो बाबूजी ? कितनी चीख़ें पढ़ पाए हो काग़ज़ पर, कितना हाहाकार पढ़े हो बाबूजी ? मेरी माँ के आंसू भी तो लिख्खे थे, मेरे घर का द्वार पढ़े हो बाबूजी ? क्या उस पर भी ख़ून के छींटे लिख्खे थे? किस-किस को मक्कार पढ़े हो बाबूजी ? दुनियां से अपराध मिटा के रख देंगे, ये जुमला कै बार पढ़े हो बाबूजी ? प्यार पे दावेदारी अब भी रखते हो ? फिर सब कुछ बेकार पढ़े हो बाबूजी, उर्मिला माधव। 11.9.2017

ख़त्म होता है

कोई किस तरहा ख़त्म होता है, बाद मरने के .....रक़्म होता है. ज़ख़्म नासूर की तरह है मगर, सिर्फ़ कहने को ज़ख़्म होता है. उर्मिला माधव