न तू देख इतने गुरूर से
न तू देख इतने ग़ुरूर से, कि मैं लौट जाऊंगी दूर से, ये पयाम तेरी नज़र को है, इसे जोड़ दिल के सुरूर से, मेरे ग़म से तू भी है, पुरअसर, मेरा दावा है मैं ग़लत नही, न तू ऐतक़ाफ़ से काम ले, आ बचा ले ख़ुद को क़ुसूर से, तू ही मेरे दिल का करार है, तुझे सोचती हूँ मैं रात दिन, मेरी शाम है तेरी जुस्तजू, है सहर भी तेरे ही नूर से, मेरे दिल का कौन हफ़ीज़ है, तेरी दूरियां ही ज़वाल हैं, ये बता कि किससे गिला करें, जो मिले हैं दर्द ग़ुरूर से, ये बयान देना पड़ा मुझे, तेरी जुस्तजू के सवाल पर, कभी ज़िन्दगी में विसाल हो, तो कहूंगी पूरे शऊर से.. उर्मिला माधव