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Showing posts from April, 2021

दिखाता रहेगा

अगर इस क़दर दिल दुखाता रहेगा, यक़ीनन ही बस आता-जाता रहेगा, तवज्जो को जाने न जाने तगाफ़ुल, फ़क़त दीदा-ए- तर दिखाता रहेगा  भटकती फ़ज़ाओं की तनहाइयों में  कब तक कोई सर झुकाता रहेगा, अजब खेल देखा ज़माने में दिल का, जो ठुकरा दे उस पर ही आता रहेगा, जहां पर कभी कोई इज्ज़त न पायी, उसी दर पे रह-रह के जाता रहेगा, उर्मिला माधव ... 28.4.2014...

क्या करें

ज़ब्त के कुछ दायरे हैं, इसके आगे क्या करें, भीड़ से उठ जाएं जा कर रूह को तनहा करें, रोज़ उठ कर सोचते हैं, क्या ख़राबी हम में है, दिल के दरवाज़े को खोलें देर तक झांका करें, कुछ नुमायां हो न पाए, फ़िक्र इसकी है हमें, पर ज़ियादा बोझ है तो किस तरह आधा करें, हर मरासिम किस क़दर तनक़ीद करता है मिरी, कौन है ग़मख़्वार किस से दर्द हम साझा करें, ज़ीस्त की अठखेलियों से ज़िन्दगी आज़िज़ हुई, रोज़ ही मर जाएं ख़ुद को रोज़ ही पैदा करें.. उर्मिला माधव

शादाब हैं

सब नुमाइश में रखे असबाब हैं, गोकि बिकके भी बहुत शादाब हैं, हमने अब पर्दे लगाए ज़ीस्त पर, देख लीजै हम कहाँ बे ताब हैं, या गुज़िश्ता वक़्त हो के आज अब, हम अज़ल से ही बहुत नायाब हैं, उर्मिला माधव