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Showing posts from December, 2022

ज़माने का

देख ले ख़ुद को ज़रा, हो कहीं ज़माने का ये मगर सोच के चल लुत्फ़ नहीं आने का रोज़ का ग़म है मगर रोज़ नहीं कहते हैं हाल कैसा भी रहे कुछ नहीं, बताने का उर्मिला माधव

भजन कर लिया

एक प्रयास हिंदी में, ------------------- मन हुआ अनमना तो,भजन कर लिया, लेके गंगा का जल आचमन कर लिया, बैठे आसन पे भी पालथी मार कर, जग के हर देवता को नमन कर लिया, जाने कितनी तरह से किया कीर्तन, अपने हाथों से पूरा जतन कर लिया, क्यों ये संसार है सोच कर थक गए, और चिंता को कितना गहन कर लिया, म्रत्यु पर्यंत दूंढा किये सार हम , अंत में मृत्यु का ही वरन कर लिया... उर्मिला माधव... २७.१२.२०१३.

मुझपे क़ाबिज़ हुआ ही चाहती है

Mujh pe bas qabiz hua hi chahti hai, ek shai ab silsila hii chahti hai, main khari utrun abas ummid par, wo mera hardam bura hi chahti hai, main kade fikron se guzrun,raat din, apne haq main bas duaa hii chahti hai, main guzarti hun,hazaaron tanz se, zakhhm dil ka wo chhua hi chahti hai, maine bhi baazi rakhi us ziist par, khelna jo bas juaa hii chahti hai... #उर्मिलामाधव... 27.12.2015

मंहगी पड़ी है

ज़िन्दगी मुझ्को बहुत मंहगी पड़ी है, पर ग़मों की दास्तां पीछे रखी है। कोई भी तन्हाई में जीने कहाँ दे, दह्र में हर रोज़ ही रस्सा कशी है। उर्मिला माधव

शिकवा नहीं

हमको तुमसे कोई भी शिकवा नहीं, क्या ये कम है ग़म हुए रुसवा नहीं, हम बख़ुद पाबंदियों के साथ थे, कोई कर पाया कभी फतवा नहीं