दुखों के आकलन होते नहीं, कौन गिन पाया है, गिरते आंसुओं को? दर्द को किसने हथेली पर रखा है? कौन सोचे क्या है क़ीमत आंसुओं की, आँख की किस्मत कहाँ लिख्खी है बोलो इस तरह सदियां गुज़ारीं, रोकती हूँ, पोंछती हूँ, रोज़ अपने आंसुओं को, लाल होकर छिल गए हैं गाल मेरे, किन्तु क्या अनुमान है पीड़ा का मुझको ? शून्य में ताका है, पहरों बैठ कर, और स्वयं को दे रही हूँ अब दिलासा, भित्तियों के साथ लग कर बैठ जाऊं, या कि फिर आँगन तेरे चक्कर लगाऊं, खिड़कियों पर हाथ है, सिसकियों का साथ है, रात गहराने लगी, नींद कब देती है बोलो साथ मेरा? ऐसा लगता है कि अंतिम एक झपकी आएगी, मैं स्वयम में और स्वयम मुझमें रहेगा फिर कहानी को कोई बच्चा कहेगा.... उर्मिला माधव..