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Showing posts from November, 2020

हवा देते हैं

jalte rahne main bhi ek khaas sukun hota hai, hum bhi ab jaanke sholon ko hawa dete hain... hampe aansu ka bahut qarz abhi baaki hai, isko her haal main har roz chuka dete hain.. tumko itni si bhi mushkil se bacha denge chalo, jo bhi ilzaam hain hum khud hi laga lete hain... Urmila Madhav 17.8.2013

हवा देते हैं

jalte rahne main bhi ek khaas sukun hota hai, hum bhi ab jaanke sholon ko hawa dete hain... hampe aansu ka bahut qarz abhi baaki hai, isko her haal main har roz chuka dete hain.. tumko itni si bhi mushkil se bacha denge chalo, jo bhi ilzaam hain hum khud hi laga lete hain... Urmila Madhav 17.8.2013

ग़म संभाल कर

वो जा चुके हैं बज़्म से,इज्ज़त उछाल कर, मैंने भी रख दिया है अभी गम संभाल कर, ख़ुद ही जवाब दूं ये कहाँ फिक्र है मुझे, हालात सच को लायेंगे बाहर निकाल कर, काँटों पे लिख रही हूँ अभी आबलों के नाम, ख़ामोश मेरे दिल, न अभी कुछ सवाल कर, इस दर्द से निजात भी मिलनी तो है ज़रूर  हो उम्र भर को मुंतज़िर,क़ायम मिसाल कर, कारीगरी अजब है मगर वक़्त की जनाब, कितनों को इसने पी लिया शीशे में ढाल कर, #उर्मिलामाधव.... 26.11.2015

बोलियां

कितनी ऊंची बोलियां,बाजार में लगने लगीं, इक शजर की डालियां थक हार कर झुकने लगीं, जाने कैसा शख़्स था किरदार से गिरता गया, और हवा के शोर से बदनामियाँ डरने लगीं, कुछ दिनों आलम रहा भरपूर जश्न-ए-ज़ीस्त का, फिर रुख़-ए-गुलज़ार पर बेज़ारियां दिखने लगीं.. आबरू से खेल करना,खेल ख़ुद से है जनाब, दह्र के उस पार भी चिंगारियां उठने लगीं, उर्मिला माधव 26.11.2017

बच्चा कहेगा

दुखों के आकलन होते नहीं, कौन गिन पाया है, गिरते आंसुओं को? दर्द को किसने हथेली पर रखा है? कौन सोचे क्या है क़ीमत आंसुओं की, आँख की किस्मत  कहाँ लिख्खी है बोलो इस तरह सदियां गुज़ारीं, रोकती हूँ, पोंछती हूँ, रोज़ अपने आंसुओं को, लाल होकर छिल गए हैं गाल मेरे, किन्तु क्या अनुमान है पीड़ा का मुझको ? शून्य में ताका है, पहरों बैठ कर, और स्वयं को दे रही हूँ अब दिलासा, भित्तियों के साथ लग कर बैठ जाऊं, या कि फिर आँगन तेरे चक्कर लगाऊं, खिड़कियों पर हाथ है, सिसकियों का साथ है, रात गहराने लगी, नींद कब देती है बोलो साथ मेरा? ऐसा लगता है कि अंतिम  एक झपकी आएगी, मैं स्वयम में और स्वयम मुझमें रहेगा फिर कहानी को कोई बच्चा कहेगा.... उर्मिला माधव..

नहीं बाक़ी

न ये बाक़ी, न वो बाक़ी, कोई जल्वा नहीं बाक़ी, वो हमको याद आते हैं के जो ज़िंदा नहीं बाक़ी, ज़मीं पे पांव रखने का, किसीको होश तब आया, के जब दुनिया-ए-फ़ानी में कोई रुतबा नहीं बाक़ी, ख़ुदी महफूज़ रखने को सिपहसालार क्या रखना, उठा ले हाथ दुनियां से तो कुछ किस्सा नहीं बाक़ी, ग़रज़ क्या आख़री हिचकी पे वो रोया, नहीं रोया, किसी की बेरुख़ी से जब कोई शिकवा नहीं बाक़ी.. उर्मिला माधव, 8.11.2018

जब्र से

आंधी से हाल-ए-वक़्त से,तूफां के जब्र से, बाहर निकल के आ गई मैं अपनी क़ब्र से, ज़िंदा जला रहे थे सभी मेरे दिल की लाश, और भीड़ में खड़ी थी कहीं मैं भी सब्र से, उर्मिला माधव.... 3.11.2016