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Showing posts from June, 2017
मैं कड़ी धूप में निकल जाऊं, अपनी मर्ज़ी से जाके जल जाऊं, जम के पत्थर सी हो गई हूँ ना, दिल ये करता है अब पिघल जाऊं, इस ज़माने से दूर जाने को, हर किसी शख़्स से बदल जाऊं, बरसों ख़ामोश रहके देख लिया, अब तो हर मुंह पै मुंह के बल जाऊँ, चलते चलते ही यूँ भी हो जाए, सबके सीने पै खाक़ मल जाऊँ.... उर्मिला माधव... 9.6.2015
मेरे अश्क़ों से मिले हो क्या कभी तुम ? मैं तुम्हें अश्कों से मिलवाने यहाँ तक लाई हूँ, जाने कितनी सीढियां चढ़के यहाँ तक आई हूँ, अनगिनत रंगों से लिख्खे वरक पढ़के आई हूँ  याद आता ही नहीं दिन,कब कहाँ हंस पाई हूँ ; ; एक वरक है लाल रंग का,खून से लिख्खा हुआ, यक-ब-यक देखा कभी बाज़ार में फेंका हुआ, क्या बताऊँ बस यही पहचान मेरी रह गई हंस गई मैं दिल मेरा बे-काम का सिक्का हुआ, ; ; खैर छोडो दूसरे रंग से भी मिलवाउंगी अब, ये यहाँ देखो हरे रंग से बहुत लिख्खा है सब, सब्ज़ पत्तों से ढका सा एक बचपन है मेरा, भूल ही जाती हूँ इसको क्यूँ कहाँ छोड़ा ऑ कब, ; ; रंग जवानी का लिखा है,जो बहुत पुर कर्ब था, जिस जगह रहती थी वो कोई घर नहीं इक क़र्ज़ था, छोलदारी ही समझ कर जिसमें रहना था मुझे, जैसे मेरी ज़िन्दगी कोई ला-इलाजी मर्ज़ था, ; ; खैर पीला रंग भी आना तो ज़रूरी था मगर, पर सफेदी ने अचानक कर दिया पूरा सफ़र, मुझको पूरी उन्सियत से ....देखते थे दीदावर कुछ नहीं बाक़ी बचा लो होगया सब दर-ब-दर, ; ; अब तो कोई रंग नहीं बाक़ी बचा है ज़ीस्त में, होगया लो खत्म करती हूँ यहीं फेहरिस्त मैं, # उर्मिलामाधव --- 2.9.2015...
बाज़ार में मात्र चार रुपयों की आती है, वो सिंदूर की डिब्बी, जो बाबू ने मेरे लिए लाखों रुपयों में खरीदी थी, सिंदूर की डिब्बी और जीवन भर की गुलामी का अनुबंध, मुझसे वो घर भी छीना था जिसे मैं अपना समझने की भूल करती रही थी, जहाँ अम्मा थीं,स्नेह शीला, एक सिंदूर की डिब्बी ने उनको भी छीना था, पराई हो जाने का ठप्पा लगाया गया था मेरे ऊपर , जहाँ से आई थी वो मेरा घर नहीं था, जहाँ आई थी वो पराया घर था, बचपन ने यही सुना कर जवानी पर धकेला था,तुम्हें पराये घर जाना है, मेरा मन कभी समझ नहीं पाया, कौन सा घर पराया था ? अम्मा वाला या सिंदूर की डिब्बी वाला ? कितनी बड़ी हो गई हूँ, पर ये दोहरा विषय अभी तक समझ में नहीं आया, मुझे लगता है औरत का कोई घर ही नहीं होता उसकी अपनी कोई पहचान होती ही नहीं यदि है भी तो एक औरत सिर्फ एक औरत, उर्मिला माधव 11.9.2015
बुरी हो या अच्छी,लड़कपन की दुनियां, बहोत याद आती है,बचपन की दुनियां, वो खड़िया से आँगन में ख़ाने बनाना, ऑ गिट्टी से उस पर निशाने लगाना, बस एक पाँव से ही मगर चलके जाना, कभी जीत जाना,कभी रो के आना, नहीं फ़िक़्र कोई,फ़क़त मन की दुनियां, बहोत याद आती है बचपन की दुनियां, वो अम्मा की साड़ी से गुड़िया बनाई ऑ गुड़िया के माथे पै बिंदिया लगाई जमा करके .....चूड़ी के टूटे से टुकड़े बहुत हसरतों से वो ...गुड़िया सजाई वो गुड़िया के चूल्हे ऑ बरतन की दुनियां बहोत याद आती है बचपन की दुनियां.. सभी अपने लगते,गली,घर ऑ आँगन, कोई ख़ान मामा.....कोई चाचा जुम्मन, सभी एक से थे,.....मुसलमां, बिरहमन, जो बच्चों का रखते,हरिक हाल में मन, ग़ज़ब थी निराली वो ठनगन की दुनियां, बहोत याद आती है बचपन की दुनियां, वो ऊंची सी दीवार,ईंटों की गलियां, जहाँ मिलके खेले कभी गुइयाँ-गुइयाँ वो मीरा,वो मृदुला,बड़ी मालती थी, मगर मुझको प्यारी थी बहना की बहियाँ न देखी कभी फ़िक़्र-ओ-उलझन की दुनिया बहोत याद आती है बचपन की दुनियां... उर्मिला माधव.. 30.9.2016
एक बचपन, तनहा माँ, शिफ़ाखानों के चक्कर काटती हुई, अतिब्बा के चेहरे ताकती हुई, वो तनहा तीन वर्ष, याद आ जाता है,माँ को, शून्य में बस देखना और सोचना, कौनसा रिश्ता,खंगालूँ? शायद कोई भी नहीं, और अगर कोई है मेहरबां, सो वो है परवर दिगार, ज़ख़्म लेकिन बेशुमार, लानतों से कान छलनी, और बचा सीना फ़िगार, यक़-ब-यक़ हो याद आया, ख़ूब रोना ज़ार-ज़ार.. वक़्त को जाना था, कबका जा चुका है, दाग़ पर सीने पे, कुछ देता गया.... उर्मिला माधव... 19.5.2017 शिफ़ाखानों... अस्पतालों अतिब्बा... हकीम, डॉक्टर
आगरे का ताजमहल और मैं बेटी वहां की, और गली कूचे वहां के, कुछ हसीं मंज़र वहां के, दौड़ कर मथुरा कभी तो दौड़ के लखनऊ कभी हाथ में कुछ रेवड़ी, जो ख़ास लखनऊ में बनी हाथ में कंचे लिए बचपन की वो यादें सभी थीं कड़ी ताक़ीद अम्मा की मगर भाती थी मन को प्यार करना सीख लो भाई बहन को कुछ समझ आया नहीं था भोले मन को क्योंकि अम्मा कह रही थीं इसलिए करना था सब कुछ पर लड़कपन वो कुलांचे मारता था, लड़कियों के खेल मुश्किल से ही खेले हाथ में मंजा,पतंगें,भाई का सामान लेकर, दौड़ कर जीने पै चढ़ना बेसबब दीदी से लड़ना सिर्फ़ अपनी ज़िद पै अड़ना और गली के बालकों संग ख़ूब गिल्ली और डंडे दुश्मनी या दोस्ती से कोई मतलब ही कहाँ था जम गए बस खेल देखा, क्या सबब,क्या था कहाँ था दोस्त कुछ थे आगरा के और कुछ थे लखनऊ के जब जहाँ मौक़ा मिला के बस वहीँ खुशियाँ सजालीं पर मेरी एक ख़ास गुईंयां वो मेरी बहना निराली वो अजब सा एक रंग था, हर समय बहना का संग था एक ज़ालिम रस्म है दुनियां की जो शादी कहाती हो गई बहना से दूरी मैं हुई तनहा अधूरी वो बहन जिसकी बिदाई पर बहुत गिरते थे आंसू औरतें सब कह रही थीं कोई बन्नी गाओ धांसू थाप ढोलक की सुना कर हौसला सब दे रहे थे ...