आजकल के लोग कुछ ज़्यादः सयाने हो गये, साल बेशक हो नया पर हम पुराने हो गए रौशनी बारूद की है,चार सू रंग-ए-क़फ़न, आदमी की ज़िन्दगी में कितने ख़ाने हो गए, इक बिखर जाता है,खींचें,ग़र सिरा हम दूसरा, क्या कहें दामन में अब इतने दहाने हो गए, होगये खामोश,दुनियां के नज़ारे देख कर, लोग ये समझा किये के हम दिवाने हो गए, हमने जब दस्तार रख दी,मंज़िलों के छोर पे, बस फ़लक़ के साए में,अपने ठिकाने हो गए, हम अज़ल से ही रहे बस,इन्तेहाई सादा दिल, दह्र की अय आंधियो ,हम क्यूँ निशाने होगये? उर्मिलामाधव... 15.7.2016
Posts
Showing posts from November, 2016
- Get link
- X
- Other Apps
वो आदमी वही है,लहजा बदल गया है, अब दरमियां हमारे,किस्सा बदल गया है, wo aadmii wahi hai,lahjaa badal gayaa hai, ab darmiyan hamaare qissa badal gaya hai, हम मुन्तज़िर रहे हैं,आने की कह गया था, गिनते हैं उँगलियों पर,हफ्ता बदल गया है, ham munzir rahe hain aane kii kah gaya tha, ginte hain ungliyon par haftaa badal gaya hai, लगता है कुछ कमी है,पहचान में हमारी, या वक़्त के मुताबिक चेहरा बदल गया है, lagta hai kuchh kamii hai,pahchan main hamaari, ya waqt ke mutabik chehra badal gaya hai, उल्फ़त का रंग लेकर आया हमारे दिल में, हैरत से देखते हैं, कैसा बदल गया है, ulfat ka rang lekar aaya hamaare dil main, hairat se dekhte hain,kaisa badal gaya hai, मजबूरियां हैं,तुझको,रब के किया हवाले, किस-किसको ये बताते,क्या-क्या बदल गया है... majbuuriyaan hain tujhko,rab ke kiya hawaale, kis-kis ko ye bataate,kya-kya badal gaya hai... उर्मिला माधव , 12.10.2015
- Get link
- X
- Other Apps
हम बहुत मजबूर होकर दर-ब-दर देखा किये, मरने वाले राह तेरी उम्र भर देखा किये देखते ही देखते हर रंग किस्मत ले उड़ी, दिल बुझा जाता था लेकिन फिर उधर देखा किये । है अजब सी दास्ताँ पर सच यही है क्या करें, रौशनी को तीरगी से पुर असर देखा किये दिल कहाँ राज़ी हुआ और ये तड़पता ही रहा, हम बहुत मायूस होकर इक नज़र देखा किये। बदहवासी का वो आलम और कुछ जोशे जुनूँ, किसको इतना होश था,बस बेख़बर देखा किये जाने कितनी मुश्किलों का सामना हमने किया, उम्र भर के हादसों को मुख़्तसर देखा किये Urmila Madhav...
- Get link
- X
- Other Apps
मेरे अश्क़ों से मिले हो क्या कभी तुम ? मैं तुम्हें अश्कों से मिलवाने यहाँ तक लाई हूँ, जाने कितनी सीढियां चढ़के यहाँ तक आई हूँ, अनगिनत रंगों से लिख्खे वरक पढ़के आई हूँ याद आता ही नहीं दिन,कब कहाँ हंस पाई हूँ ; ; एक वरक है लाल रंग का,खून से लिख्खा हुआ, यक-ब-यक देखा कभी बाज़ार में फेंका हुआ, क्या बताऊँ बस यही पहचान मेरी रह गई हंस गई मैं दिल मेरा बे-काम का सिक्का हुआ, ; ; खैर छोडो दूसरे रंग से भी मिलवाउंगी अब, ये यहाँ देखो हरे रंग से बहुत लिख्खा है सब, सब्ज़ पत्तों से ढका सा एक बचपन है मेरा, भूल ही जाती हूँ इसको क्यूँ कहाँ छोड़ा ऑ कब, ; ; रंग जवानी का लिखा है,जो बहुत पुर कर्ब था, जिस जगह रहती थी वो कोई घर नहीं इक क़र्ज़ था, छोलदारी ही समझ कर जिसमें रहना था मुझे, जैसे मेरी ज़िन्दगी कोई ला-इलाजी मर्ज़ था, ; ; खैर पीला रंग भी आना तो ज़रूरी था मगर, पर सफेदी ने अचानक कर दिया पूरा सफ़र, मुझको पूरी उन्सियत से ....देखते थे दीदावर कुछ नहीं बाक़ी बचा लो होगया सब दर-ब-दर, ; ; अब तो कोई रंग नहीं बाक़ी बचा है ज़ीस्त में, होगया लो खत्म करती हूँ यहीं फेहरिस्त मैं, # उर्मिलामाधव ---...