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ज़ब्त करना

ज़ब्त करना अगर मुहाल हुआ, हां मगर तोड़ कर मलाल हुआ, ख़ुद ही सकते में आ गए हम भी, इतनी ऊंचाई पर ज़वाल हुआ, उर्मिला माधव  मर तो सकते थे पर अजब है ये, ख़ून ही दिल का पर हलाल हुआ रंग दुनिया का सर जमाल हुआ.. उर्मिला माधव 

गुनाह कर बैठे

हाए ये क्या गुनाह कर बैठे? ख़ुद ही ख़ुद को तबाह कर बैठे, ज़ब्त से काम ले रहे थे हम, जाने क्यूँ एक आह कर बैठे, भूल कर भूल हो गई हमसे, तेरी चाहत की चाह कर बैठे, किस क़दर हमसे ये गुनाह हुआ, ग़लतियाँ बेहिसाब कर बैठे, कितनी चाहत थी हँसके जीने की, फिरभी मरने की राह कर बैठे, ज़िन्दग़ी दूर-दूर होती गई, मौत से जो सलाह कर बैठे।....उर्मिला माधव.. 5.3.2013

फिर भी

एक पल की नहीं ख़बर फिर भी हमको लगता नहीं है डर,फिर भी, दम ब दम इम्तिहान देते हुए, पूरा करना ही है सफ़र, फिर भी, दह्र इंसां की इक कसौटी है, उसपे टूटा हुआ हो घर फिर भी, यूं ही हँसके निबाह करना है, चाहे थक जाए ये नज़र फिर भी, हमसे लाखों गुनाह हो जाएं, बंद होता नहीं ये दर, फिर भी, उर्मिला माधव
उम्र भर तो सब्र का दामन संभाला, अब भला हम किसलिए शिकवा करेंगे, वो जो मेरी ज़ीस्त का हिस्सा नहीं है, उससे फिर हम राब्ता भी क्या करेंगे, रोज़ उसको हम तड़पता देखते हैं  देखते रहते हैं उसको हम तड़पते, कौनसा रास्ता भला हम वा करेंगे हम क़दम आगे बढ़ा कर 

ये दिल ढूंढता है

ये दिल ढूँढता है जगहा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी, कभी ज़िंदगी में ये दिन भी दिखाना, के हर सम्त इक अजनबी रंग लाना, ज़मीं अजनबी,आसमां अजनबी हो, कोई शख्स हो रु-ब-रु,अजनबी हो, लगे जिसकी हर इक अदा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी..... हथेली पे कुछ नाम हों अजनबी से, पढ़े ही न जाएँ,पढ़ें हम कहीं से, मिले जो बशर वो बशर,अजनबी हो, सुनो मुख़्तसर,कुल दह्र अजनबी हो, मिले दर्द-ए-दिल को दवा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी... उर्मिला माधव ... 4.3.2016...

ग़ैरों की मिल्कियत पे

एक मतला दो शेर --- गैरों की मिलकियत पे कोई बात क्या करे, वीरान रहगुज़र पे .......कोई रात क्या करे, सूरज निकल रहे हैं कई सम्त से हज़ार, पर तिश्नगी को लेके मुलाक़ात क्या करे, हमको सरापा आग ने जब ख़ाक कर दिया, ज़ख़्मों की ऐसी शक़्ल का बरसात क्या करे, उर्मिला माधव.. 4.3.2017

मानी कहां

इल्तिजा उसने मेरी मानी कहाँ, पर मिरे भी सब्र का सानी कहाँ, कांपती आवाज़ में रोका किये, उसने वो आवाज़ पहचानी कहाँ, सूखती है ये सरापा भीग कर,  इश्क़ की बुनियाद में पानी कहाँ, मैंने उसके हाल पर छोड़ा उसे, हो सकी तब कोई मनमानी कहाँ, उर्मिला माधव...